अमोल सरोज

सामाजिक न्याय की चाह रखने वाले मराठी फ़िल्म “कोर्ट” ज़रूर देखें- अमोल सरोज

1947 में देश आजाद हुआ। 1950 में संविधान आया। उस संविधान में देश के हर नागरिक को मौलिक अधिकार दिए गए। मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए क़ानून बनाये गए। ऊँच नीच ख़त्म किया गया। अमीर-ग़रीब सबके लिए क़ानून एक बनाया गया। काग़ज़ पर लिखे नियमों को लागू करने की ज़िम्मेदारी न्यायपालिका ,संसद और पुलिस को दी गयी। भारत में न्यायपालिका और पुलिस इस काम को कैसे अंजाम देती है इस विषय को लेकर निर्देशक चैतन्य तम्हाने ने अपनी पहली मराठी फिल्म बनायीं “कोर्ट ”

फिल्म की कहानी एक एक्टिविस्ट नारायण कांबले की कहानी है जो गली गली में लोक गीत गाकर दबे कुचले लोगों को अन्याय के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित करता है और ये सब काम वो भारतीय संविधान के अंदर रहकर लोकतान्त्रिक तरीके से करता है। उसे पुलिस द्वारा एक सीवर में काम करने वाले कर्मचारी को आत्म हत्या के लिए उकसाने के जुर्म में गिरफ्तार कर लेती है। सीवर कर्मचारी की सीवर की सफाई करते वक्त मौत हो जाती है जिसे पुलिस आत्महत्या मानती है और नारायण कांबले के गानों को इसके लिए जिम्मेदार मान उसे गिरफ्तार कर लेती है।

पुलिस गिरफ्तारी के बाद सामाजिक कार्यकर्ता और नारयण कांबले का वकील विनय वोरा कोर्ट की तरफ रुख करता है ताकि नारायण कांबले को बेल मिल सके। किस तरह निरपराध नारायण कांबले जिसके खिलाफ कोई भी सबूत न होते हुए भी बेल न मिलने के कारन जेल में रखा जाता है,किस तरह पुलिस की पिछली ज्यादतियों को ही नारायण कांबले के खिलाफ सबूत के रूप में पेश किया जाता है। कैसे तंत्र लोक की जुबान को खामोश करने के लिए काम करता है ये सब बहुत बारीकी से बिना किसी नाटकीय इफेक्ट के बहुत जानदार तरीके से फिल्म में दिखाया गया है। एक सीन में नारायण कांबले के केस के बाद अगले केस के लिए एक लड़की का नाम बुलाया जाता है जैसे ही लड़की पेश होती है जज उसकी डेट कैंसिल कर के अगली तारीख दे देता है। कारण ? लड़की ने स्लीव लेस कमीज पहनी हुई होती है जो जज साहब को कोर्ट की गरिमा के अनुरूप नहीं लगती। आख़िरकार लम्बी जद्दोजहद के बाद एक लाख की रकम जमानत के तौर पर जमा कराने जब नारायण कांबले को जमानत मिलती है तो दूसरे ही दिन पुलिस उन्हें फिर किसी फर्जी अपराध में पकड़ लेती है इस बार उन्हें जमानत नहीं मिल पाती।

भारतीय डेमोक्रेसी में फ्रीडम ऑफ़ स्पीच और नागरिकों के लिए आवाज उठाने वालो के मानवीय अधिकारों की क्या स्थिति है इसका बहुत संजीव वर्णन करती है फिल्म कोर्ट। फिल्म में आखिर में बीमार नारायण कांबले की जमानत अर्जी को ठुकरा कर जज साहब समर वेकशन पर फैमिली के साथ घूमने निकल जाते है। उनकी समर वेकेशन पर फिल्म फिल्म खत्म हो जाती है।

फिल्म हर इंसान को देखनी चाहिए। कम से कम सामाजिक न्याय की चाह रखने वालों लोगों को तो जरूर देखनी चाहिए

( अभी इसी हफ्ते कम्युनिस्ट नेता कोबाड गाँधी को 9 साल जेल में रहने के बाद जमानत मिली थी जिसके अगले दिन ही वो पुलिस द्वारा दोबारा गिरफ्तार कर लिए गए। )

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copyright © 2017 | Bharat Duniya | Managed By Lokbharat Group

To Top