अमोल सरोज

‘शशि कपूर का नाम याद आते ही मुहब्बत पर यक़ीन आता है’

शशि कपूर और आनंद बक्शी की “जब जब फूल खिले” वो फ़िल्म थी जिसे देखकर प्यार पर बेहताशा प्यार आया। जब भी प्यार में डूबा तो “अफ्फ़ू ख़ुदाया” वाले गाने के शशि कपूर की तरह नाचना शर्माना अपने आप होता गया। कलाबाज़ी खाने की भी कोशिश की पर वो लगी नहीं कभी। नए-नए प्यार का स्वाभाविक चित्रण और किस गाने में है मुझे ध्यान नहीं आता।

“एक था गुल और एक थी बुलबुल ” जब शशि कपूर सुनाता था तो यक़ीन होने लगता था कि प्यार गुल और बुलबुल की तरह ही करना चाहिए। जितनी मासूमियत से शशि कपूर कहता है
“वो गुल ऐसे शरमाता था जैसे मैं घबरा जाता हूँ”

दिल में कुछ-कुछ होने लगता था। जब सैयाद चमन में आने की बात शशि कपूर करता है तो हर बार दिल की धड़कन बढ़ जाती है। शा’इर लोग जब उनकी जुदाई का मौसम बयाँ करते है तो दिल रोने जैसा हो जाता है। फिर जब सारा ज़माना और सारी ख़ुदाई बुलबुल को रोकने में नाकाम हो जाती है तो मन नाचने का करता है। जिस विश्वास से शशि कपूर ये कहानी सुनाता है लगने लगता है कि प्यार से बेहतर कोई शय दुनिया में है ही नहीं।

सिर्फ प्यार ही नहीं शशि कपूर हर्ट होना भी सिखाते है। पता नहीं शायद इसी फिल्म का असर है या कुछ और। मैंने ज़िन्दगी में जाने कितनी बार बड़ी कोठियों के ड्राइंग रूम में खुद को आहत हुआ पाया है। आज भी जब भी किसी आलिशान महल में जाने का मौका आता है तो उसके ड्राइंग रूम की चीजों को छूने से डर लगता है दिल अंदर से शशि कपूर की तरह गा रहा होता है

“तेरे ऊँचे महल में नहीं मेरा गुज़ारा
मुझे याद आ रहा है वो छोटा सा शिकारा।”

“जब जब फूल खिले ” और “आ गले लग जा” दोनों फिल्मों की टूटी फूटी नकल से लेकर सीन दर सीन कॉपी तक कितनी ही फ़िल्में बन चुकी है। दोनों ही फ़िल्में जाने कितनी बार देख चुका हूँ। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब इन दोनों फिल्मो के गाने ना गुनगुनाएं हों.

“वादे गये बातें गईं, जागी-जागी रातें गईं
चाहा जिसे मिला नहीं, तो भी कोई गिला नहीं

अपना तो क्या जिये मरे चाहे कुछ हो
तुझको तो जीना रास आ गया

जाने तू या जाने ना, माने तू या माने ना”

प्यार में जब दर्द होता है तो इस गाने को गाता शशि कपूर अपने आप याद आ जाता है। सच है कि हर इंसान को एक दिन मरना ही है। शशि कपूर को भी जाना ही था। किसी के मरने न मरने से कुछ फर्क़ नहीं पड़ता। फर्क़ इस बात से पड़ता है कि किसी के दुनिया से चले जाने से आपके ज़हन में क्या याद आता है। शशि कपूर का नाम याद आते ही मुहब्बत पर यक़ीन आता है। भेड़ को सर पर उठाये मुहब्बत में डूबा इंसान नजर आता है जो सब से कह रहा होता है

मरना,जीना,खाना,पीना
हँसना,रोना,नहाना,धोना
सोना,उठना,चलना, फिरना
आना जाना
हम दीवाने ने मुहब्बत में भुलाया

~

अमोल सरोज

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