असरार उल हक़ "मजाज़"

मजाज़ की ग़ज़लें: “दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता-ए-जफ़ा पे कहीं”

दिल-ए-ख़ूँ-गश्ता-ए-जफ़ा पे कहीं
अब करम भी गराँ न हो जाए

तेरे बीमार का ख़ुदा-हाफ़िज़
नज़्र-ए-चारा-गराँ न हो जाए

इश्क़ क्या क्या न आफ़तें ढाए
हुस्न गर मेहरबाँ न हो जाए

मय के आगे ग़मों का कोह-ए-गिराँ
एक पल में धुआँ न हो जाए

फिर ‘मजाज़’ इन दिनों ये ख़तरा है
दिल हलाक-ए-बुताँ न हो जाए

असरार उल हक़ “मजाज़”

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