असरार उल हक़ "मजाज़"

मजाज़ की ग़ज़लें: धुआँ सा इक सम्त उठ रहा है शरारे उड़ उड़ के आ रहे हैं,

धुआँ सा इक सम्त उठ रहा है शरारे उड़ उड़ के आ रहे हैं,
ये किस की आहें ये किस के नाले तमाम आलम पे छा रहे हैं

नक़ाब रुख़ से उठा चुके हैं खड़े हुए मुस्कुरा रहे हैं
मैं हैरती-ए-अज़ल हूँ अब भी वो ख़ाक हैराँ बना रहे हैं

हवाएँ बे-ख़ुद फ़ज़ाएँ बे-ख़ुद ये अम्बर-अफ़्शाँ घटाएँ बे-ख़ुद
मिज़ा ने छेड़ा है साज़ दिल का वो ज़ेर-ए-लब गुनगुना रहे हैं

ये शौक़ की वारदात-ए-पैहम ये वादा-ए-इल्तिफ़ात-ए-पैहम
कहाँ कहाँ आज़मा चुके हैं कहाँ कहाँ आज़मा रहे हैं

सुराहियाँ नौ-ब-नौ हैं अब भी जमाहियाँ नौ-ब-नौ हैं अब भी
मगर वो पहलू-तही की सौगंद अब भी नज़दीक आ रहे हैं

वो इश्क़ की वहशतों की ज़द में वो ताज की रिफ़अतों के आगे
मगर अभी आज़मा रहे हैं मगर अभी आज़मा रहे हैं

अता किया है ‘मजाज़’ फ़ितरत ने वो मज़ाक़-ए-लतीफ़ हम को
कि आलम-ए-आब-ओ-गिल से हट कर इक और आलम बना रहे हैं

असरार उल हक़ “मजाज़”

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