असरार उल हक़ "मजाज़"

मजाज़ की ग़ज़ल: दामन-ए-दिल पे नहीं बारिश-ए-इल्हाम अभी

दामन-ए-दिल पे नहीं बारिश-ए-इल्हाम अभी,
इश्क़ ना-पुख़्ता अभी जज़्ब-ए-दरूँ ख़ाम अभी

ख़ुद ही झुकता हूँ कि दावा-ए-जुनूँ क्या कीजिए
कुछ गवारा भी है ये क़ैद-ए-दर-ओ-बाम अभी

ये जवानी तो अभी माइल-ए-पैकार नहीं
ये जवानी तो है रुस्वा-ए-मय-ओ-जाम अभी

वाइज़ ओ शैख़ ने सर जोड़ के बदनाम किया
वर्ना बदनाम न होती मय-ए-गुलफ़ाम अभी

मैं ब-सद-ब-सद-फ़ख़्रिया ज़ुहहाद से कहता हूँ ‘मजाज़’
मुझ को हासिल, शर्फ़-ए-बैअत-ए-ख़य्याम अभी

असरार उल हक़ “मजाज़”

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