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जानिये रमज़ान के बारे में: रोज़ा, सहरी, इफ़्तार, तरावीह…

इस्लामी कैलेण्डर का 9वाँ महीना होता है रमज़ान. यह रमज़ान का महीना 29 या 30 दिन का होता है. इस महीने में मुसलमान समाज के लोग रोज़े रखते हैं. रोज़े का अर्थ है सुबह से पहले सहरी होती है, सहरी में कुछ हल्का-फुल्का खाना होता है. फ़ज्र (सुबह की नमाज़) की अज़ान हो जाने के बाद से लेकर मग़रिब (शाम की नमाज़) की अज़ान तक कुछ नहीं खाना-पीना होता है. दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि सुबह से लेकर शाम तक कुछ ना तो खा सकते हैं और ना ही पी सकते हैं. इसके अतिरिक्त रमज़ान में किसी को गाली, किसी के बारे में बुरा भी नहीं सोच सकते, किसी को ग़लत नज़रों से देखना या कोई और बुरा काम करना रमज़ान में बिलकुल मना है या यूँ कहें कि रमज़ान में इसको लेकर ज़्यादा सख्ती है.

इस्लाम के पाँच फ़र्ज़ में से एक रमज़ान के महीने में दुनिया भर के मुसलमान बड़ी ख़ुशी से मानते हैं. मुसलमानों के विश्वास के अनुसार इस महीने की २७वीं रात शब-ए-क़द्र को क़ुरान का नुज़ूल (अवतरण) हुआ. इसी लिये, इस महीने में क़ुरान ज़्यादा पढना पुण्यकार्य माना जाता है.

सहरी: रोज़ा रखने से पूर्व खाया जाने वाला भोजन जो आम तौर पर बहुत हल्का फुल्का होता है. ये भोर होने से पहले होता है.
इफ़्तार: रोज़ा खोलने(पूरा हो जाने) के वक़्त खाया जाने वाला भोजन होता है. भारतीय समाज में इफ़्तार के लिए लोग बड़े मन से इंतज़ाम करते हैं. इसमें ख़जूर,अन्य फल, शरबत, पकौड़ियाँ, पापड़, दही-वड़े, वगीबो, परांठे, बिरयानी, इत्यादि पकवान तैयार किये जाते हैं. आजकल के दौर में लोग कोल्ड ड्रिंक भी इफ़्तार के लिए रखते हैं. इन सब पकवानों के बावजूद सबसे अधिक कुछ अगर रोज़ा खोलने के वक़्त लोगों को अज़ीज़ होता है तो वो है पानी. सुबह से पानी को तरसे शरीर को जब पानी मिलता है तो सुकून मिलता है. अक्सर लोग इफ़्तार पार्टी भी करते हैं, इसमें मेज़बान अपनी तारफ़ से लोगों को दावत देता है, इसमें वो लोग भी शामिल हो सकते हैं जिन्हें दावत नहीं दी गयी है. इफ़्तार में हिन्दू, इसाई, सिख और दूसरे धर्म के लोग भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं, कई बार इफ़्तार पार्टी भी अन्य धर्म के लोग होते हैं.

तरावीह: ईशा (रात की नमाज़) के बाद पढ़ी जाने वाली नमाज़ जो सिर्फ़ रमज़ान के महीनों में पढ़ी जाती है. इसमें क़ुरआन की आयतें पढ़ी जाती हैं.
ज़कात: इस्लाम के पवित्र ग्रंथ क़ुरआन के मुताबिक़ हर एक समर्पित मुसलमान को साल (चन्द्र वर्ष) में अपनी आमदनी का 2.5 % हिस्सा ग़रीबों को दान में देना चाहिए। इस दान को ज़कात कहते हैं.

[Featured Image: Setareha]

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