साहिर की नज़्म,”गर जंग लाज़िमी है तो फिर जंग ही सही”

हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़   गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही ज़ालिम को जो

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जब अमोल सरोज ने लिखा मेनका गाँधी को ख़त, “…तभी आपका हार्मोन ऑउटबर्स्ट वाला स्टेटमेंट आ गया और मुझे ऋषि कपूर का वो गाना याद आ गया”

मेनका जी, प्रणाम ! मैं भाभी जी कहना चाहता था पर मुझे नारीवाद की बेड़ियों ने रोक लिया। संजय भाई

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सआदत हसन “मंटो” की कहानी- टोबा टेक सिंह

बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का

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अमोल सरोज की वाल से,’जब एक नारे से ही सारे देशद्रोही काम जस्टिफाई हो जाएँ तो समस्या कहाँ है!’

मेरे दिमाग़ के रैम में कुछ कैमिकल लोचा हो गया है । कुछ से कुछ याद आने लगता है ।

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ऑडियो: नौजवान शा’इर शारिक़ सिद्दीक़ी की ग़ज़ल,”काश निकलूँ किसी बहाने से”

शारिक़ सिद्दीक़ी काशीपुर के रहने वाले एक नौजवान शा’इर हैं. कई मुशाइरों में अपना कलाम पढ़ चुके शारिक़ की एक

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मीडिया और करप्शन-1: “मलिक साहब अच्छे इंसान हैं, बुरी तो शराब है”

पिछले साल मेरी मुलाक़ात एक ‘मलिक साहब’ से हुई और उनसे मिलने के बाद मुझे ये असल में एहसास हुआ

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