क्या से क्या हो गया!

July 19, 2017 by No Comments

राजनीति में उतार चढ़ाव आम बात है. आज कोई पार्टी मज़बूत है कल कोई और. आज कोई नेता ऐसा लग रहा है मानो कभी चुनाव हारेगा नहीं तो आने वाले समय में वही नेता इस स्थिति में भी पहुँच सकता है कि वो कोई चुनाव कभी जीतेगा नहीं. कुछ यही क़िस्सा आज भारतीय जनता पार्टी के एक समय के सबसे मज़बूत नेता लाल कृष्ण अडवानी के बारे में नज़र आता है. एक समय था जब दिसम्बर 2006 में अडवानी ने एलान कर दिया था कि वो प्रधानमंत्री उमीदवार हैं.

उनके एलान को पूरी भाजपा ने तुरंत मान भी लिया था. उन्हीं की उमीदवारी में भाजपा ने 2009 का चुनाव लड़ा लेकिन UPA एक बार फिर चुनाव जीत गयी और मनमोहन सिंह एक बार फिर प्रधानमंत्री चुने गए. इसके बाद भी लोगों का यही मानना था कि अडवानी ही भाजपा के 2014 के प्रधानमंत्री उमीदवार होंगे लेकिन जून 2013 में उन्हीं की पार्टी ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री उमीदवार चुना. इसके साथ ही अडवानी के राजनीतिक करियर के अंत की शुरुआत हुई. 2014 के चुनाव को भाजपा गठबंधन (NDA) ने ज़बरदस्त जीत हासिल की और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने.

इसके बाद कुछ यूं अटकले चलीं कि अडवानी को राष्ट्रपति पद दिया जा सकता है लेकिन बाबरी मस्जिद गिराने के सम्बन्ध में उनपर लगे क्रिमिनल कांस्पीरेसी के चार्ज की वजह से वो संभावनाएं भी ख़त्म होती रहीं. अब जबकि राष्ट्रपति के चुनाव भी हो चुके हैं और उप-राष्ट्रपति के लिए भी भाजपा ने अपना उमीदवार वेंकैया नायडू को बना दिया है तो शायद अब अडवानी को कुछ भी न मिले. उम्र के इस पढ़ाव पर अब जो भी उन्हें मिलना था वो या तो मिल चुका है या नहीं मिला. “हिन्दुत्वादी” भाजपा को खड़ा करने में लाल कृष्ण अडवानी का बड़ा योगदान माना जाता है लेकिन आज उनकी पूछ उन्हीं की पार्टी में ना के बराबर हो गयी है. राजनीति में क्या से क्या हो जाता है ये कोई कहाँ जान सकता है.

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