रिपोर्ट: रिक्शे वालों पर बुरी पड़ी है नोटबंदी की मार

लखनऊ: साइकिल रिक्शा चलाने वाले लोग बहुत ग़रीब होते हैं. अगर आप उनसे बात करिए तो वो आपको बताएँगे कि वो किस तरह से अपनी रोज़ी रोटी कमाने दूर-दराज़ के गाँव से यहाँ आये हैं. अक्सर तो ये रिक्शा किराए पर लेते हैं, एक दिन का किराया 30 से 40 रूपये तक होता है. रिक्शा मालिक कभी कभी उसी कंपाउंड में जहाँ रिक्शा खड़ा होता है वहीँ उन्हें रहने को जगह दे देता है.

नोटबंदी से पहले की बात की जाए तो रिक्शे वालों की कमाई बेहतर थी. वो दिन भर रिक्शा चला कर 250 से 350 रूपये बचा लेते थे. एक रिक्शे वाले ने हमें बताया कि रिक्शे का किराया और खाना-पीना हटा कर इतनी कमाई हो जाती थी. नोटबंदी के बाद लेकिन कमाई बुरी तरह प्रभावित हुई है. एक रिक्शे वाले ने बताया कि जब नोटबंदी हुई, उस वक़्त तो हमने ऐसा दौर भी देखा कि दिन भर खड़े रहे और कोई रिक्शा पे नहीं बैठा. सुनील नाम के एक रिक्शा चालक ने बताया कि नवम्बर और दिसम्बर का महीना इस तरह से रहा कि कई रिक्शे वाले अपने गाँव लौट गए.

फ़िलहाल स्थिति में क्या सुधार है अगर इस बारे में आप बात करते हैं तो कहते हैं कि अब कुछ हालात ठीक हुए हैं लेकिन दिन भर रिक्शा चलाने के बाद भी 180 रूपये ही आते हैं जिसमें रिक्शे का किराया भी देना होता है. कई और रिक्शे वालों से जब हमने बात की तो वो भी नोटबंदी के बाद रिक्शा चालकों की परेशानी बढ़ी है ऐसा ही बताते हैं. हालाँकि इसके पीछे कुछ और कारण भी लोगों ने बताये. एक साइकिल रिक्शा वाले ने हमें बताया कि नोटबंदी तो है ही साथ ही ये ई-रिक्शा की वजह से भी परेशानियाँ बढ़ी हैं… ई-रिक्शा गलियों में भी चला जाता है जहाँ ऑटो नहीं जाता था. इस वजह से साइकिल रिक्शा का चलन कम हुआ है और ई-रिक्शा का किराया कम रहता है क्यूँकी शेयरिंग पर भी काम करता है ये और साइकिल-रिक्शा में ये मुमकिन ही नहीं.

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