2017 की घटनाएँ: तुर्की के साथ से मज़बूत हुआ क़तर, झुकाने की कोशिश पर नहीं झुका

पश्चिम एशिया की बात करें तो साल 2017 की जो सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं उसमें क़तर डिप्लोमेटिक क्राइसिस भी शामिल है. क़तर डिप्लोमेटिक क्राइसिस के ज़रिये जहाँ सऊदी अरब और उसके मित्र देशों ने क़तर पर दबाव बनाने की कोशिश की वहीँ क़तर को तुर्की का समर्थन मिला और उसने इस दबाव का शानदार तरह से मुक़ाबला किया.

ये क्राइसिस तब शुरू हुआ जब 5 जून को अचानक ही सऊदी अरब, UAE, बहरीन और मिस्र ने क़तर से अपने सभी सम्बन्ध ख़त्म कर लिए. इसमें एम्बेसडर्स को वापिस बुलाने से लेकर व्यापारिक पाबंदी और ट्रेवल पाबंदी भी शामिल रही. इस क्राइसिस के आगे बढ़ने पर मामला क़तर और सऊदी अरब के बीच का हो गया और दोनों देशों के बीच ज़बरदस्त बयानबाज़ी हुई. सऊदी अरब जिस बात को लेकर नाराज़ था उसकी एक वजह क़तर और ईरान के सम्बन्ध थे. सऊदी अरब और उसके मित्र देशों को अल-जज़ीरा चैनल की रिपोर्टिंग का तरीक़ा भी ठीक नहीं लगता था. सऊदी अरब और उसके मित्र देशों का आरोप है कि क़तर उग्रवादी गतिविधियों करने वाले संघठनों की मदद करता है.

फ़्रांस, कुवैत, और तुर्की जैसे देशों की मध्यस्थता से एक समय ये उम्मीद बनी थी कि ये क्राइसिस सुलझ जाएगा मगर ऐसा ना हो सका. 27 जुलाई, 2017 को क़तर के विदेश मंत्री मुहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने रिपोर्टर्स से साफ़ कहा कि मिस्र, सऊदी अरब, UAE और बहरीन इस क्राइसिस को ख़त्म नहीं करना चाहते और इसके लिए कोई क़दम नहीं उठा रहे हैं. साल ख़त्म हो गया है लेकिन अभी ये क्राइसिस ख़त्म नहीं हुआ है. अब देखते हैं कब ये क्राइसिस ख़त्म होता है.

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