आज़ादी के मायने और स्वतंत्रता दिवस…

August 16, 2017 by No Comments

3 अगस्त को पंजाब के लुधियाना शहर की रहने वालीं प्रियंका शर्मा ने “Independence Day: आपकी नजर में आजादी क्या है ?” के नाम से फेसबुक पर इवेंट शुरू किया| इस इवेंट की ही सीरीज़ में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में “जय हिन्द-हस्ताक्षर अभियान” चलाया गया| 14 अगस्त को हुए इस हस्ताक्षर अभियान में अतुल अनजान जैसे लोगों ने भी भागीदारी की| उन्होंने कहा कि ये एक अभिनव अभियान है| इसके बारे में हमने अलग ख़बर लगायी है| यहाँ हम सोशल मीडिया पर आये उन संदेशों को साझा कर रहे हैं जो फेसबुक इवेंट पर साझा किये गए|

रांची की रहने वाली स्वाति शबनम लिखती हैं
आज़ादी, एक ऐसी चीज़ जिसके लिए हमेशा से पूरी दुनिया में कितने लोगों ने जान तक की बाज़ी लगाई है, आज भी लगा रहे हैं. सबके लिए आज़ादी के मायने ज़रूर अलग अलग हैं, मगर जो एहसास है वो कमोबेश एक ही है.
अभी अभी समर गाथा में ‘समर्पण’ की यह पंक्तियां पढ़ीं-
समर्पण
उन सबको
जिन्होंने मनुष्य की स्वाधीनता और स्वाभिमान के उस पुरातन संग्राम में, जो अभी समाप्त नहीं हुआ,
अपने प्राणों की आहुति दी
इसी किताब में कहीं साइमन (मकाबी) कहता है- “आज़ादी क्या कोई कोट है कि जब चाहा पहन लिया जब चाहा उतार दिया”.
नहीं, आज़ादी कोई कोट नहीं है, यह एक सतत विचार है, भाव है, विश्वास है, और अगर कोई आज़ादी में विश्वास करता है तो उसका विस्तार हर एक मनुष्य की आज़ादी के सम्मान तक होना ही चाहिए.
जब स्कूल कॉलेज में थी, मतलब लड्डू और परेड के आकर्षण के बाद के दौर में, तब आज़ादी से जुड़ी हुई जो चीज़ सबसे ज़्यादा सालती थी वह थी विभाजन-
ये दाग दाग उजाला, ये शबगज़ीदा सहर
मगर धीरे धीरे और बहुत सी अन्य चीजों के प्रति भी गुस्सा और अफसोस पैदा होने लगा, इतना ज्यादा कि कई बार आज़ादी नकली लगने लगी. दरअसल हम, मतलब वह पीढ़ी जिसका जन्म आज़ाद भारत में हुआ है, और पिछली भी, शायद उस तरह से आज़ादी की कीमत नहीं पहचानते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि 15 अगस्त 1947 को मिली आज़ादी एक राजनैतिक घटनाक्रम था. आज़ादी के आंदोलन के दौरान विकसित राजनैतिक चेतना के प्रभाव में स्वाभाविक तौर पर लोकतंत्र की स्थापना हुई, वयस्क मताधिकार, जो उस समय भी सभी देशों में नहीं था, एक ऐसा हथियार था जिसने अचानक सारी ताकत जनता के हाथों में सौंप दी. यह अलग बात है कि भारत में जातिवाद के रूप में अंदरूनी विभाजन की जड़ें इतनी गहरी हैं कि शोषण और अत्याचार की अंतहीन प्रक्रिया जारी रही, आज भी जारी है.
असल में हर युग की अपनी प्रगतिशीलता होती है, और हर लड़ाई का अपना तात्कालिक लक्ष्य होता है. सोच कर कलेजा मुंह को आता है कि शुरुआती विद्रोह (यहां तक कि 1857 और उसके बाद भी) कितने छिटपुट और असंगठित थे. आखिर अंग्रेजों की बंदूकों के सामने तिलका मांझी, सिदो कान्हो, बिरसा मुंडा के तीरों की क्या बिसात रही होगी. मगर आज़ादी तो विचार है, जज़्बा है, हर दौर में हर तरह से मनुष्य इसके लिए लड़ते रहे हैं. और भारत में भी हर कोई अपने ढंग से तब तक लड़ता रहा जब तक कि गांधी और कांग्रेस के नेतृत्व में आजादी के आन्दोलन को एक ठोस दिशा नहीं मिल गयी. और तब इतनी लंबी और थकाऊ लड़ाई को खत्म करना ही एकमात्र लक्ष्य था.
बहुत कुछ किया जाना बाकी था, अब भी बाकी है. बहुत लंबी लड़ाई है आगे, सामाजिक क्रांति, लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास, समाज में भी और राजनीति में भी. प्रतिगामी ताकतें इन कोशिशों को तोड़ेंगी, मगर ‘आज़ादी’ के इस संघर्ष को हमें मिलजुल कर अभी बहुत आगे तक ले जाना है.

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जुनैद अहमद जुनैद लिखते हैं..
हमारे देश को आज़ाद हुवे अभी 70वर्ष ही हुऐ है ।लेकिन ये हमारा दुर्भाग्य कह जाए के हम आज़ादी को पुरी तरहा एन्जाँय भी नही कर सके थे के भारत का विभाजन हो गया।फिर गाँधी जी की हत्या।चीन और पाकिस्तान से युध्द।देश मै अनगिनत दंगे ।हमे आज़ादी के बाद ये सब देखना को मिला।और आज भी हम हिन्दू मुसलमान छुआ छूत जैसे छोटे कामो मै लगे ।हर धर्म दूसरे धर्म से भयभित है।
अमीरो के हाथ या उच्च जाती वालो के पास सत्ता है।ग़रीबो को शोषण हो रहा है।योग्य लोग अयोग्य हो कर बैठे है।
नारी जात के साथ आज भी बल्तकार हो रहै है उन्है सही सम्मान नही मिल पा रहा है।
देश मै कई बड़े घोटाले हुवे।अपराधि निर्भिक है।हाँ
हमने अंग्रेजो से तो आज़ादी प्राप्त कर ली है।लेकिन अपने अन्दर के शैतान को मारना अभी बाकी है।जब तक हमारे अन्दर का शैतान नही मरता जब तक हमारी आज़ादी अधूरी है।
मै दावे के साथ कह सकता हूँ के हमने देश की आज़ादी का मज़ा अभी पुरी तरहा उठाया नही है।अभी हमारे देश को आज़ादी का लुत्फ उठाना बाकी है।जब तक हमारा मन मस्तिषक पुरी तरहा निर्भिक हो कर जीवन व्यतित नही करता जब तक हमारी आज़ादी अधूरी है।
सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजो से आज़ाद होने का नाम आज़ादी नही है।अभी हमारे मन मस्तिषक के एक बड़े अत्याचारी शैतान को मरना ज़रूरी है।
और मै आशा करता हूँ को वो सुब्ह ज़रूर होगी ।
भारत ज़िन्दाबाद

अमोल सरोज स्टेटस वाला के लेखक अमोल सरोज लिखते हैं-
आजादी पर क्या लिखूँ समझ नहीं आ रहा है। देश को आजाद हुए 70 साल होने को है। 15 अगस्त 1947 को भारत को दो देशों में बाँटकर अँग्रेज भारत छोड़ कर चले गए थे। अंग्रेजों ने भारत पर दो सौ साल राज किया। उससे पहले अलग अलग क्षेत्रों पर अलग अलग राजाओ का राज था। 1947 के बाद लोकतंत्र की स्थापना भारत में हुई। यानी देश की जनता अपने वोट देकर खुद अपने प्रतिनिधि तय करती है और वो प्रतिनिधि मिलकर देश को चलाते है। स्वाभाविक है ये प्रक्रिया जनता को ज्यादा अधिकार देने के लिए अपनाई गयी ताकि आम जनता के हित के काम हो सकें। सबको रोटी कपड़ा और मकान मिले। आजादी के 70 साल बाद जातिवाद ने अपने क्रूर चेहरे पर थोड़ी सी प्लास्टिक सर्जरी करा ली है। 1947 के बाद छुआछूत को अपराध माना गया। भारत देश में पहले मेहनतकश जनता से उन्ही की मेहनत पर ऐश करने वाली कुछ जातियों के लोग इतनी नफरत करते थे कि उन्हें हाथ तक नहीं लगाते थे। पर उनका मैला वही उठाते थे। भारतीय कानून ने सबको समान अधिकार देते हुए इस बर्बर व्यवहार को अपराध माना। अब घर घर सीवर आ चुके है सीवर साफ़ करने वालों की बस्तियाँ शहर के एक कोने में हैं। उन्हें हाथ लगाने की जरुरत ही नहीं पड़ती। छुआछूत आज भी घृणित तरीके से जारी है।
जातिगत आधार पर लैंगिक आधार पर धर्म के आधार पर भेदभाव अब भी जारी है। देश के संशाधनों पर भी कुछ ही लोगों का अधिकार है। किसान हर साल आत्महत्या कर रहे है। मुझे निजी तौर पर नहीं लगता आजादी कोई ऐसी चीज है जिसे किसी एक दिन को प्राप्त कर के आराम से बैठा जा सकता है। आजादी के लिए हर रोज संघर्ष करना पड़ता है ।जहाँ संघर्ष में , मेहनत में कमी हुई वहीं आजादी ख़तरे में है । जो लोग आजादी के दुश्मन है ग़ुलामी के समर्थक है वो कभी हार नही मानते मेहनत भी करते है आपस मे लड़ते भी नही ।हमें क्या करना है ये हमें ही तय करना है
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समाचार वेबसाइट भारत-दुनिया से जुड़े अरग़वान रब्बही लिखते हैं..
आज़ादी जैसे मैंने समझी.
जब मैं छोटा था तो आज़ादी के दिन और गणतंत्र दिवस को लेकर ख़ासा उत्साह रहता था. हम सब स्कूल जाते वहाँ बूंदी के लड्डू मिलते और कुछ अच्छी बातें बतायी जातीं. जब तक इस्लामी दर्सगाह मदरसे में पढ़ा तो वहाँ इस दिन राष्ट्र गान गाया जाता और साथ में “लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी” गायी जाती| जब बड़े होकर हाफ़िज़ सिद्दीक़ इस्लामिया इंटर कॉलेज में पढने गया तो वहाँ राष्ट्रगान और क़ौमी तराना सुना|
इस वक़्त तक मुझमें आज़ादी के दिन को लेकर जो विशेष जगह बननी चाहिए थी वो बन चुकी थी लेकिन सही मायनों में आज़ादी क्या है ये तब पता चला जब आज़ादी के पीछे और आसपास के इतिहास को पढ़ा. मैं बार बार 1857 की क्रांति पढता और अफ़सोस में डूब जाता कि हमारी हार कैसे हो गयी| मैं बार बार बेगम हज़रत महल कैसे अपने अवध को बचा ले जातीं ये कहानियां बुनता रहता. लगातार रानी लक्ष्मीबाई के बारे में सोचता कि वो कैसे हार गयीं. मंगल पांडे को लेकर एक क़िस्म का जज़्बा उठता था लेकिन कहीं ना कहीं ये लगता था कि उन्हें प्लान से अलग नहीं जाना चाहिए था| मौलवी अहमदुल्लाह, नाना साहब, तांत्या टोपे, के बारे में और पढने का मन करता रहा लेकिन कुछ ख़ास मुनाफ़ा ना हुआ| शायद इससे भी ज़्यादा और भयानक दुःख था बहादुर शाह ज़फ़र की हार और उसके बाद उनका रंगून में क़ैदी की ज़िन्दगी गुज़ारना रहा| इस दरम्यान उनका एक शे’र मेरे सीने से लिपट गया-
“ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की,
तख़्त ए लन्दन तक चलेगी तेग़ हिन्दुस्तान की”
बहरहाल,
इसके पीछे जाकर सेरिरंगापत्तम में टीपू सुलतान की हार ने भी लगातार मुझे दुःख दिया|
इस ग़म के दौर ने मुझसे ऐसी दोस्ती की थी कि मैं बजाय वक़्त को आगे ले जाने के उसी में बंधा रहता. कुछ महीनों बाद मैंने गुज़रे वक़्त की गलियों पर क़दम आगे बढाए और आज़ादी के क़रीब आ पहुंचा. इस दौर में वो हार जीत वाला मामला नहीं है. इस दौर में अगर कहीं बड़ा ग़म है तो वो जलियाँवालां बाग़ नरसंहार है, उसके बाद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान जैसे क्रांतिकारियों के किस्से लेकिन इसी दौर में एक और महान नेता चले| चितरंजन दास मेरे सबसे पसंदीदा नेताओं में से एक रहे हैं, सही मायनों में आज़ादी के ठीक मायने चितरंजन दास और डेरोज़ियो ने ही मुझे समझाए, डेरोज़ियो ने तो जब बात उठायी तब बात ही इतनी नयी थी कि उनके साथ ज़्यादा लोग नहीं आ सके लेकिन दास ने ये कोशिश की कि जितनी भी आज़ादी मिले वो ले लो क्यूंकि अगर बिलकुल आज़ादी नहीं होगी तो कुछ नहीं होगा जिसकी वजह से उन्होंने स्वराज पार्टी बनायी तब कांग्रेस ने उनके विचारों का विरोध किया लेकिन बाद में कांग्रेस ने भी माना कि पूर्ण स्वराज से पहले भी कुछ मिल रहा हो तो ले लेना चाहिए|
थोडा आसपास अगर जाएँ तो सरोजनी नायडू, ऐनी बेसेंट, गोपाल कृष्णा गोखले,रबिन्द्र नाथ टैगोर, मौलाना मुहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, हकीम अजमल ख़ान, जैसे क़द्दावर नेता कुछ ना कुछ शिक्षा मानव जाति को देते रहे|
जवाहर लाल नेहरु ने जो बयान आज़ादी मिलने के बाद दिया वो तो मशहूर ही है लेकिन मुझे नेहरु 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज दिवस मनाये जाने की वजह से ज़्यादा याद रहते हैं| रेड शर्ट मूवमेंट वाले ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान हों या भुलाभाई देसाई सबका एक बड़ा स्थान है|
महात्मा गाँधी ने आज़ादी के दिशाहीन आन्दोलन को एक दिशा दी और लगातार देश को समझने की कोशिश की| अपनी जान की क़ुर्बानी देकर उन्होंने भारत की बची-खुची एकता को बचाया था| सुभाष चन्द्र बोस, बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने कुछ अलग रास्ते चुने आज़ादी के लिए जिसमें बोस का रास्ता क्रांतिकारी था तो आंबेडकर का रास्ता सामाजिक आज़ादी के संघर्ष को बुनियाद देने का था| बाबा साहब ने आज़ादी के लिए तो काम किया ही लेकिन उन्होंने जो काम 1920 और 1930 के दशकों में किया उसकी वजह से ही दलितों को आज़ादी के बाद हक़ मिले और सामाजिक न्याय की बात हुई| हालाँकि संविधान में दिए गए ये हक़ कितने मिल पा रहे हैं इस पर पूरी बहस है लेकिन जो कुछ भी है वो उन्हीं की वजह से ही है|

वैसे आज़ादी को समझने के लिए ये समझना भी ज़रूरी है कि हम ग़ुलाम कैसे हुए थे और क्या कारण थे? अगर गौर करें तो आये तो मुग़ल भी बाहर से थे लेकिन उनके दौर को ग़ुलामी का दौर नहीं कहा जाता| सिर्फ़ मुग़ल ही नहीं, आर्यन, अफ़ग़ान..सभी इस देश में कभी ना कभी तो आये ही हैं लेकिन जो दौर अंग्रेज़ों का था उसी को ग़ुलामी का दौर कहा जाता है|
इसकी सबसे बड़ी वजह जो मेरी समझ आती है वो ये है कि पहले के बादशाह या शासक जो थे वो सिर्फ़ लूटने के इरादे से भारत में नहीं रहे.. मुग़ल आये बाहर से थे लेकिन यहीं के हो गए| वो जो लाये थे वो भी यहीं है और जो उन्होंने इस देश से हासिल किया वो भी यहीं है| उन्होंने इस देश की जनता को कभी ग़ुलाम की हैसियत से नहीं देखा जबकि दूसरी ओर जब अंग्रेज़ी कंपनी का शासन आया तो उन्होंने भारतीय भाषाओँ, समाज, संस्कृति, को ख़त्म करने की कोशिश की और एक व्यापारी की तरह से जो भी उनका था वो थोप दिया और ऐसा भी नहीं कि उन्होंने ये सब हमारे मुल्क के लिए किया था क्यूंकि वो आये भी इंग्लैंड से थे और गए भी इंग्लैंड| वो यहाँ सिर्फ़ और सिर्फ़ लूटने के मक़सद से आये थे जबकि इसके पहले जो भी लोग बाहर से आये थे फिर वो चाहे अफ़ग़ान हों या मुग़ल हों या कोई और… जहां मुग़ल किसी तरह का अकाल पड़ने पर जनता को ज़रूरी मदद देने की कोशिश करते थे वहीँ अँगरेज़ ऐसा कुछ होने पर बिहार में गोलघर बनवाकर अनाज भर लेते थे ताकि अंग्रेज़ी फ़ौजी को खाना मिलता रहे और जनता जाए चूल्हे में| इस तरह के बहुत से मामले हैं..
1857 की क्रांति में मुग़ल सम्राट को इसीलिए नेता चुना गया क्यूंकि सिर्फ बहादुर शाह ज़फ़र ही थे जिनके नाम पर देश एक हो कर लड़ सकता था| इससे ही पता चलता है कि मुग़लों की क्या हैसियत थी तब कि भारतीय हृदय में| वक़्त गुज़रता है तो हम बहुत सी बातों को अलग तरह से समझने की कोशिश करते हैं…आज वो दौर है जब औरंगज़ेब की बुराई ज़्यादा होती है लेकिन ये औरंगज़ेब ही था जिसने अंग्रेज़ों को इस बुरी तरह हराया था कि नाक रगड़ने पर मजबूर कर दिया था|

समाचार वेबसाइट मध्यमार्ग से जुड़ी हुईं रितु सिंह अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखती हैं..
मेरे लिए आज़ादी माने मिर्चपुर
आज़ादी माने खैरलांजी
आज़ादी माने भगाना
आज़ादी माने लक्ष्मणपुर बाथे
आज़ादी माने रमाबाई नगर
आज़ादी माने उना
आज़ादी माने सहारनपुर
आज़ादी माने रोहिथ
आज़ादी माने जीसा
आजादी माने डेल्टा
आज़ादी माने बिल्किस
आज़ादी माने मुत्थु कृष्णन
आज़ादी माने जुनैद
आज़ादी माने अखलाक
आज़ादी होने की उम्मीद जरूर है।

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