अकबर इलाहाबादी: शोषक के अत्याचार पर तंज़ कसने वाला शायर ..

खींचो न कमानो को,न तलवार निकालो
जब तोप मुक़ाबिल हो, तो अख़बार निकालो

ये मशहूर शेर है महान शायर अकबर इलाहाबादी का जिनका जन्म आज ही के दिन 1846 में हुआ था। शोषक के अत्याचार पर तंज़ कसते हुए आम इंसानो के दुःख दर्द को शायरी का रूप देने में अकबर साहब माहिर थे। उनकी शायरी पढ़ कर लगता है कि वक़्त बदलता है इंसानी फितरत नहीं बदलती। आज भी जब फेसबुक पर हिन्दू-मुस्लमान अपने-अपने धर्म की वकालत में जिरह करते नजर आते है तो अकबर याद आते है

“मज़हबी बहस मैंने की ही नहीं
फालतू अक्ल मुझ में थी ही नहीं ”

जब कोई धर्म के रस्ते पर चलने की हिदायत देता नजर आता है तो अकबर याद आते है

“बोले कि तुझ को दीन की इस्लाह फ़र्ज़ है
मैं चल दिया ये कह के कि आदाब अर्ज है ”

जब किसी अस्पताल में लाश के बदले परिजनों से जमीन के कागज़ रखते हुए देखता हूँ तो अकबर याद आते है

“इनको क्या काम है मुरव्वत से अपनी रुख से ये मुंह न मोड़ेंगे
जान शायद फ़रिश्ते छोड़ भी दे डॉक्टर फीस को न छोड़ेंगे। ”

जब किसी वकील को जमीन , तलाक़ , या आपसी विवादों में गरीब इंसान का खून चूसते देखता हूँ तो अकबर याद आते है

“पैदा हुए वकील तो शैतान ने कहा
तो आज हम भी साहिब ऐ औलाद हो गए ”

जब विज्ञान की मदद से बने हथियारों से बमबारी से छोटे छोटे बच्चो को मरते देखता हूँ तो अकबर साहब याद आते है

“जान ही लेने की हिकमत में तरक्की देखी
मौत को रोकने वाला तो कोई पैदा न हुआ ”

जब प्राइवेट सेक्टर में दस दस घंटे काम करते और छुट्टियों को तरसते दोस्तों को देखता हूँ तो अकबर अपने आप जुबान पर आ जाते है

“नौकरो पर जो गुज़रती है मुझे मालूम है
बस करम कीजिये मुझे बेकार रहने दीजिये ”

जब दो जनरेशन आपस में उलझती हुई दिखती है तो अकबर याद आते है

“पुरानी रोशनी में और नई में फ़र्क़ है इतना
उसे कश्ती नहीं मिलती इसे साहिल नहीं मिलता”

देश के हुक्मरान जब लोकतंत्र की , आजादी की बात करते है तो अकबर याद आते है

“क्या ग़नीमत नहीं ये आज़ादी
साँस लेते हैं, बात करते हैं!”

आज के नौजवानों की पसंद और समझ पर अफ़सोस होता है तो अकबर याद आते है

“क़द्रदानों की तबीयत का अजब रंग है आज
बुलबुलों को ये हसरत, कि वो उल्लू न हुए.”

बहरहाल खुशकिस्मती ये है कि वो अपने जीवन काल में किसी सीए से नहीं मिले. अंत में दोस्तों के नाम अकबर इलाहाबादी का ये शेर।

“जो जिसको मुनासिब था गर्दूं ने किया पैदा
यारों के लिए ओहदे, चिड़ियों के लिए फन्दे”

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अमोल सरोज

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