डर कर रास्ता न बदलें महिलाएं, खुद को इतना मज़बूत बनाएं कि डर रास्ता बदल ले..

January 5, 2018 by No Comments

क्या कभी ऐसा हुआ है कि बहुत व्यस्त घंटे के बाद आपने काम से सर उठाया हो और ऑफिस में अचानक बहुत सन्नाटा पाकर आपने अपनी रीढ़ में हल्की सी एक झुरझुरी महसूस की हो कि आप झुटपुटे या अंधेरे में ऑटो से कहीं जा रहे हों, और बाकी सारे लोगों के उतर जाने के कारण ऑटो में अकेले रह जाने पर आपने गंतव्य से पहले ही उतर जाना और किसी भरे ऑटो में बैठ जाना चाहा हो 

आप पैदल कहीं जा रहे हों और थोड़ी दूर में हँसते ठहाके लगाते लोगों के झुंड को देख कर आपने रास्ता बदलने का सोचा हो कि ट्रेन में अकेले यात्रा के दौरान आपने किताब या फ़ोन पकड़ कर भी उसे पढ़ने या देखने की तुलना में अपने सहयात्रियों को परखने में ज़्यादा वक़्त बिताया हो

ट्रेन में ही रात के दो बजे नींद खुलने पर अपने टॉयलेट जाने के लिए सुबह के छः बजने का इंतज़ार किया हो अगर आप लड़की नहीं हैं तब नहीं,  मेरी माँ एक्टिविस्ट रही है, बहुत घूमी है अकेले यहां वहां, महिला मुद्दों पर बहुत सजग और स्पष्ट, मगर उसने कहा कि डरो, मतलब सावधान रहो, लड़की का पूरा जीवन डर (सावधानी) के साथ बीतता है

उसे हर जगह अपनी सुरक्षा के लिए सावधान रहना ही पड़ेगा खासकर अगर वह आत्मनिर्भर है और अपनी ज़िम्मेदार खुद है, बाहर अकेली आती जाती है, यहां तक कि घर में भी. किसी पर भी आंख बंद कर के भरोसा मत करो, खून के रिश्तों पर भी नहीं, चाहे जितना बुरा लगे मगर हर किसी को संदेह से देखो, यह भी अपनी सावधानी का ही हिस्सा है. और हम लड़कियों के पास इस सावधानी का कोई सब्स्टीट्यूट नहीं है.

ये आर्टिकल रांची की स्वाति शबनम द्वारा लिखा गया है

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