अगर बैलेट पेपर से चुनाव हो जाए तो भाजपा सत्ता में नहीं आएगी: मायावती

December 2, 2017 by No Comments

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने एक बार फिर EVM गड़बड़ी को मुद्दा बनाया है. उन्होंने उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव के नतीजों के बाद कहा कि अगर भाजपा वाक़ई में ईमानदार है और लोकतंत्र में यक़ीन रखती है तो EVM हटा दे और बैलट पेपर से चुनाव कराये. उन्होंने कहा कि आम चुनाव 2019 में हैं और ऐसे में अगर भाजपा को लगता है कि लोग उसके साथ हैं तो वो बैलट पेपर लागू कर दे. मायावती ने कहा कि मैं गारंटी देती हूँ कि अगर बैलट पेपर से चुनाव हो जाए तो भाजपा सत्ता में नहीं आ सकेगी.

इसके पहले कल उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव के नतीजे आ गए. नतीजे आने के साथ-साथ EVM धांधली की ख़बरें भी आयीं और चुनाव आयोग ने एक बार फिर इस पर कुछ ना कहना ही ठीक समझा.सहारनपुर की एक निर्दलीय उमीदवार ने दावा किया कि एक बूथ पर उसे कोई भी वोट नहीं मिला जबकि ये वही बूथ था जिसपर उसने और उसके परिवार ने वोट डाला था. इसको लेकर सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो गया जिसके बाद जनता फिर से ये पूछने लगी कि EVM गड़बड़ी की ख़बरें बार-बार क्यूँ आ रही हैं. जहां भाजपा समर्थक EVM का बचाव करते नज़र आ रहे हैं वहीँ विपक्ष के लोगों का भरोसा EVM से लगभग उठ चुका है. अब चर्चा इस बात की भी हो रही है कि कहीं गुजरात चुनाव में भी इसी तरह की गड़बड़ी की ख़बरें ना आयें. कुल मिलकर इन सब में चुनाव आयोग की साख भी दांव पर लगी है.

गौर करने की बात है कि EVM गड़बड़ी की बात इस साल तब आयी जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों वाले दिन बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष ने कहा कि उनकी हार की वजह EVM गड़बड़ी है. बसपा ने दावा किया कि जिसने हाथी का बटन दबाया उसका वोट भी भाजपा को ही गया. पंजाब में भी आम आदमी पार्टी ने इस तरह की बात कही. इसको लेकर आप नेता अरविन्द केजरीवाल ने बाक़ायदा डाटा भी सामने रखा. इसके बाद समाजवादी पार्टी, राजद, कांग्रेस समेत कई बड़े दलों ने EVM मशीनों के साथ VVPAT लगाने की मांग की. हालाँकि बसपा जैसी पार्टियों का यही कहना रहा है कि निष्पक्ष मतदान बैलट पेपर से ही हो सकता है. चुनाव आयोग हालाँकि EVM को हटाना नहीं चाहता और लगातार ये कह रहा है कि EVM से निष्पक्ष चुनाव होते हैं लेकिन विपक्षी दल ये मानने को तैयार नहीं हैं.

हालाँकि इस बार उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में सिर्फ़ EVM गड़बड़ी की बात ही नहीं आयी बल्कि बड़े स्तर पर वोटर-लिस्ट में लोगों के नाम ग़ायब रहे. कुछ लोगों ने इसे साज़िश बताया. इसको लेकर भी सोशल मीडिया पर बड़ी बहस हुई. कई प्रत्याशियों ने दावा किया कि जिस इलाक़े में उनके वोट थे उस पूरे इलाक़े के ही वोट लिस्ट में नहीं हैं. अब ये साज़िश है या गड़बड़ी लेकिन चुनाव आयोग को इसे हलके में नहीं लेना चाहिए. अगर इसी तरह से बार-बार ख़बरें आएँगी तो आयोग के ऊपर से लोगों का विशवास उठ जाएगा और शायद लोकतंत्र भी कमज़ोर हो जाएगा.

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