चीख़ते रहते हैं ट्रम्प लेकिन उनकी सुनता कोई नहीं.. !

September 17, 2017 by No Comments

1991 में सोवियत रूस के विघटन के बाद वैश्विक राजनीति में दो की जगह सिर्फ़ एक ‘सुपर पॉवर’ रह गयी और वो थी संयुक्त राज्य अमरीका. 91 के दौर के बाद अमरीका ने अकेले ही पूरी दुनिया की राजनीतिक उथल पुथल में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दख़ल दिया. फिर चाहे वो बोस्निया वॉर हो, अफ़ग़ानिस्तान युद्ध या फिर ईराक़ युद्ध, इन सभी और इनके इलावा भी जितने कनफ्लिक्ट रहे हैं उसमें अमरीका ने सक्रिय भूमिका निभायी है. लगभग हर बार अमरीका की बात लगभग आसानी से मान ली गयी है.

जॉर्ज बुश जूनियर के नव-रूढ़ीवाद के बाद बराक ओबामा ने कोशिश की कि संयुक्त राज्य अमरीका उन देशों से भी अच्छे सम्बन्ध कर ले जिनसे अच्छे नहीं हैं. इस पहल में उन्हें कामयाबी भी मिली और ईरान, उत्तरी कोरिया, क्यूबा जैसे देशों से रिश्ते सुधरे वहीँ म्यांमार में लोकतंत्र की स्थापना का क्रेडिट भी अमरीका के ही पास गया.

पर जबसे डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति पद संभाला है, अमरीका के लिए ख़बरें अच्छी नहीं आयी हैं. ईरान से रिश्ते बिगड़े हैं, पडोसी देश मेक्सिको से भी बड़ा विवाद हो गया और नार्थ कोरिया से ऐसी अनबन हुई है कि नार्थ कोरिया अब संयुक्त राज्य अमरीका की किसी भी चेतावनी की परवाह नहीं कर रहा.

एक महीने में 6 परमाणु परीक्षण करने वाला उत्तरी कोरिया लगातार संयुक्त राज्य अमरीका के मित्र देश और यहाँ तक कि अमरीका पर भी हमले की चेतावनी देता है लेकिन अमरीका इस पर कोई सख्त कार्यवाही नहीं कर पा रहा. वहीँ चीन और रूस पहले ही अमरीका की बात सुनना बंद कर चुके हैं. कुल मिला कर अब वो स्थिति हो गयी है कि अमरीकी राष्ट्रपति की बात ना तो कोई मान रहा है और ना ही कोई ये केयर करता है कि ट्रम्प क्या बोल रहे हैं.

नार्थ कोरिया के मुद्दे पर एक सख्त प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में पास करवाने की अमरीका की कोशिशों को चीन और रूस ने नाकाम कर दिया. इतना ही नहीं फ़्रांसिसी राष्ट्रपति इम्मानुएल मैक्रॉन ने अमरीका से अलग बात करते हुए कहा कि नार्थ कोरिया से बातचीत की जानी चाहिए. रोहिंग्या के मुद्दे पर भी अमरीकी सरकार म्यांमार की औंग सैन सू की की सरकार पर दबाव बनाने में नाकाम ही दिखी है. वहीँ ईराक़ के कुर्दिस्तान रेफेरेंडम को अमरीका ने रोकने की कोशिश की लेकिन KRG(कुर्दिस्तान रीजनल गवर्नमेंट) नहीं मानी.

इन सभी बातों से यही पता चलता है कि अमरीका का “सुपर पॉवर” का दर्जा अब ख़त्म होने की कगार पर है. मेक्सिको से विवाद शुरू करते ही ट्रम्प ने बड़ी ग़लती कर दी थी क्यूंकि इसके बाद अमरीका को क्षेत्रीय शक्ति की तरह व्यवहार करना पड़ा है.

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