दलित, आदिवासी महिलाओं के साथ हो रहे यौन उत्पीड़न की कोई सुनवाई नहीं, ये बात सामाजिक न्याय की है

March 13, 2018 by No Comments

देश में महिला अपराध का स्तर जितना बढ़ चुका है, उतना ही उन्हें इन्साफ मिलने का स्तर कम हो चुका है। हर दिन ऐसे कई मामले होते हैं, जिनमें महिलाओं को इंसाफ मिलने के लिए सालों-साल लग जाते हैं। लेकिन महिला, जब दलित वर्ग से आती हो तो उसे इन्साफ मिलना बहुत मुश्किल कर दिया जाता है।
दरअसल दलित महिलाओं के साथ इस देश में अपराध स्तर बहुत ज्यादा है, पिछड़े इलाकों में ऊँची जाति के लोग, दलित महिलाओं का शोषण सिर्फ महिला होने के लिए नहीं, बल्कि दलित, आदिवासी महिला होने के लिए करते हैं। जहाँ बड़े शहरों में बलात्कार, छेड़खानी की सुनवाई होने के आसार होते हैं, इन पिछड़े इलाकों में दबंग सरेआम दलित परिवारों की महिलाओं के साथ छेड़खानी करते हैं और पुलिस भी उनपर कोई कार्रवाई नहीं करती।
कई मामले तो ऐसे हैं, जहाँ दलित, आदिवासी महिलाओं का शोषण पुलिस ही करती है।  ‘दलित स्त्री शक्ति’ नाम के एनजीओ के लिए सोशल वर्कर के रूप में काम करने वाली सुषमा देवी ने कहा कि ज्यादातर महिलायें समाज में शर्मिंदगी के कारण बलात्कार की घटनाओं के बारे में किसी से ज़िक्र नहीं करती और जो महिलायें इसके खिलाफ आवाज़ उठती हैं, पुलिस इनका एफआईआर नहीं दर्ज करती और न ही नेशनल मीडिया इन्हें कवर करती है। जिसके लिए अपराधियों के हौंसले खुल जाते हैं और कई बार ऐसे घिनोने अपराधों को अंजाम देता है।

वर्ष 2011 में आए जनगणना के ताज़ा आंकड़े के अनुसार उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र में देश की 42% दलित आबादी है।  नेशनल मूवमेंट फॉर दलित जस्टिस एनजीओ के महासचिव रमेश नाथन ने कहा कि यह अपराध सिर्फ यौन उत्तेजना के चलते नहीं किए जाते बल्कि वो इस तरह के अपराधों से अपराधी अपनी जातीय श्रेष्ठता को भी पीड़ित पर सिद्ध करना चाहते हैं।

एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि दलित महिला का बलात्कार, एक दलित की हत्या की तुलना में तीन गुना अधिक है और दलित की संपत्ति जलाए जाने की तुलना में 15 गुना अधिक है। दलितों के खिलाफ हो रहे अत्याचार के मामलों का तेजी से कार्रवाई करने के लिए हर राज्य सरकार के लिए ज़रूरी किया गया है कि वो पर्याप्त संख्या में विशेष अदालतें बनाये। ऐसे मामलों में चार्जशीट दाखिल होने के दो महीने के भीतर केस का निपटारा हो जाना चाहिए।

डिपार्टमेंट ऑफ़ सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट द्वारा जारी 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, 36 ज़िलों वाले महाराष्ट्र में 3 विशेष अदालतें हैं। दूसरी तरफ 75 ज़िलों वाले उत्तर प्रदेश में 40 विशिष्ट अदालतें हैं। दलित महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे अपराधों के खिलाफ और उन्हें न्याय न मिलने के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता जिग्नेश मेवानी ने ट्विटर पर कहा है की ये बात सामाजिक न्याय की है।

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