उर्दू की बेहतरीन समझ रखने वाले दिलीप साहब करते थे लेखकों की मदद

October 9, 2017 by No Comments

बॉलीवुड के इतिहास में अगर सबसे अच्छे एक्टर्स की बात की जायेगी तो सबसे ऊपर की फ़ेहरिस्त में दिलीप कुमार का नाम आएगा. वैसे दिलीप कुमार का असली नाम मुहम्मद युसूफ़ ख़ान है लेकिन फ़िल्मी दुनिया में दिलीप कुमार के नाम से ही वो जाने जाते हैं. 11 दिसम्बर 1922 को पेशावर में जन्म लेने वाले दिलीप कुमार ने अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत 1944 में आयी फ़िल्म ज्वार भाटा से की. दिलीप साहब को लेकिन बड़ी कामयाबी फ़िल्म जुगनू से मिली. 1947 में आयी इस फ़िल्म में उनके साथ नूरजहाँ ने भी मुख्य किरदार निभाया था.

आज़ादी के बाद उनकी शहीद और मेला फ़िल्में भी कामयाब रहीं लेकिन 1949 में फ़िल्म अंदाज़ ने उनकी पॉपुलैरिटी को और बढ़ा दिया. इस फ़िल्म में उनके अलावा राज कपूर और नर्गिस भी थे. इसके बाद उन्होंने कभी मुद कर नहीं देखा और लगातार एक के बाद एक ऐसी फ़िल्में दीं कि उनकी एक्टिंग का लोहा सबने माना. 1950 से 60 के दौर में उन्होंने बाबुल, दीदार, आन, देवदास, आज़ाद, यहूदी, मधुमती और कोहिनूर जैसी फ़िल्मों में काम किया. इसी दौर में के. आसिफ़ की फ़िल्म मुग़ल ए आज़म भी आयी. मुग़ल ए आज़म में पृथ्वी राज चौहान ने अकबर बादशाह की भूमिका निभायी थी जबकि दिलीप कुमार ने उनके बेटे का रोल अदा किया था. फ़िल्म में मधुबाला ने अनारकली का किरदार निभाया था. बॉम्बे टॉकीज़ द्वारा निर्मित ये एक ब्लैक एंड वाइट फ़िल्म थी. दिलीप कुमार को उर्दू में इस क़दर महारत थी कि वो उस दौर में लेखकों को सहयोग करने लगे.

इस दौर में उन्हें हॉलीवुड से भी रोल ऑफर हुआ. उन्हें लॉरेंस ऑफ़ अरेबिया फ़िल्म में शरीफ़ अली का किरदार निभाने का ऑफर मिला था लेकिन उन्होंने इस रोल को करने से इनकार कर दिया. इसके बाद उनकी गंगा जमुना और राम और श्याम फ़िल्में आयीं.

1970 के दशक में उनको बहुत कामयाबी नहीं मिली. दास्तान और बैराग जैसी फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिट गयीं. 1976 के बाद उन्होंने फ़िल्मों से ब्रेक ले लिया और 5 साल के ब्रेक के बाद वो 1981 में एक बार फिर फ़िल्मी पर्दे पर नज़र आये. क्रांति फ़िल्म में ज़ोरदार भूमिका निभाने के बाद वो अमिताभ बच्चन के साथ शक्ति में नज़र आये. अपनी इस दूसरी पारी में उन्होंने मशाल और करमा जैसी फ़िल्मों में भी काम किया. 1991 में राजकुमार के साथ आयी उनकी फ़िल्म सौदागर को भी ख़ूब सराहना मिली. उनकी आख़िरी फ़िल्म क़िला थी.

दिलीप साहब को कुल 8 फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिले हैं. उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया है. पाकिस्तान के सबसे बड़े सिविलियन अवार्ड निशाना ए इम्तियाज़ से भी उन्हें नवाज़ा गया है.

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