बिछ गई बिसात, “गुजरात में किसकी शह और किसकी मात”

November 8, 2017 by No Comments

गुजरात में चुनावों का बिगुल बज चुका है। चुनाव आयोग ने 9 दिसंबर से 18 दिसंबर को मतदान की तिथि निर्धारित की है। जाहिर है गुजरात में बिसात बिछ चुकी है और सियासत के खिलाड़ी भी अपने मोहरों को बिछा कर चौसर पर अपनी चाले चलने लगे हैं। सियासत के इन खिलाड़ियों की आपसी जंग काफी रोचक है। जिसपर न केवल गुजरात की, पर देश की निगाहें भी लगी हुई हैं। ये देखना काफी दिलचस्प होगा कि गुजरात का ऊंट किस करवट बैठेगा। गुजरात की दोनों मुख्या पार्टियां 22 सालों से सत्तासीन बीजेपी और मुख्या विपक्षी कांग्रेस गुजरात के मैदान में एक बार फिर आमने-सामने हैं। परन्तु कौन अपनी चालों में सफल होगा और कौन फेल होगा। ये तो वक़्त ही बतायेगा।

गुजरात में जीत का सेहरा किस के सिर बंधेगा। ये कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन फिर भी रणभूमि में उतरे रणबांकुरो और उनकी रणनीतिओं में कुछ कयास तो जरूर लगाए जा सकते हैं। जिसे नकारना भी शायद आसान नहीं होगा। तो आइये चलिए कुछ पल गुजरते हैं गुजरात की विसात में।
दोनों ही पार्टियों की रणनीतियों की तस्वीर तकरीबन साफ़ हो चुकी है। वैसे तो गुजरात का चुनाव हर बार हाई वोल्टेज रहा है। लेकिन इस बार ये विभिन्न कारणों से दिलचस्प हो गया है और सबकी जिज्ञासओं का केंद्र भी बन गया है। गुजरात की साढ़े 4 करोड़ जनता किस और मुख करेगी। इन्ही सवालों का उत्तर खंगलाने का प्रयास इस समय जारी है। दोनों ही पार्टियां गुजरात के 4 करोड़ 32 लाख मतदाताओं को अपनी और करने के लिए तरह-तरह की रणनीतियां के साथ राजनीतिक हथकंडों का भी भरपूर इस्तेमाल कर रही है। बीजेपी के सामने जहाँ अपना किला बचाने की चुनौती हैं। वहीँ कांग्रेस अपना 22 साल का सूखा खत्म करना चाह रही है। इसके लिए दोनों ही जी-तोड़ प्रयास भी कर रही है। दोनों के सामने गुजरात में नेतृत्व का संकट है।

इसलिए जहाँ बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री मोदी मोर्चा संभाले हुए हैं। वहीँ कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी। ये चुनाव मोदी बनाम राहुल की भी शक्ल ले रहा है। इसलिए चुनाव की बाजी जीतना दोनों के लिए नाक की लड़ाई भी बन गया है। जिसपर दोनों का भविष्य भी काफी हद तक निर्भर है।
गुजरात की जीत को दोनों ही 2019 के चुनाव में मनाना चाहेंगे। बीजेपी ने धार्मिक कार्ड खेलते हुए हिंदुत्व के साथ-साथ विकास को अपने प्रचार के केंद्र में रखा है। हिंदुत्व की ठोस धरातल के साथ “हूँ-हूँ गुजरात-हूँ हूँ विकास” .मैं गुजरात हूँ- मैं विकास हूँ के नारे के साथ चुनाव मैदान में उत्तरी है या उसके पास नरेंद्र मोदी का चेहरा है। जिन्हे वह गुजरात का गौरव बता रही है। यह बात दीगर है की इस बार का चुनाव उनकी गैर-मौजूदगी में हो रहा है। हाल में चुनाव घोषणा के पूर्व प्रधानमंत्री के लगातार अचानक दौरे को इसी भरपाई के रूप में देखा जा रहा है। बीजेपी 22 सालों की एंटी इनकमबेसी और राज्य में हुए आंदोलनों के असर को कम करने के लिए विकास कार्यों के प्रचार के साथ हिंदुत्व का भी भरपूर इस्तेमाल कर ही है। जो उसकी मुख्य चुनावी नीति भी बन गई है।

उसकी कोशिश मतदाताओं को ये सन्देश देने की है कि कांग्रेस अल्पसंख्यकों की हितेषी पार्टी है। हाल में अहमद पटेल और पी.चिदंबरम के कश्मीर के बयानों को लेकर उसकी सक्रियता और आक्रामकता उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है। दरअसल बीजेपी की अंदरूनी रणनीति यही रहती है कि चुनाव बिहार की तर्ज पर जाति आधारित न होने पाए। इसके बरक्स उसमे धर्म का तड़का हो। लेकिन गुजरात में कांग्रेस बीजेपी की इन चालों में इस बार सजग दिखाई पड़ती है। इसलिए अहमद पटेल को लकर उसने पलटवार किया। वहीँ चिदंबरम के बयान पर उनसे किनारा कर उन्हें चुप रहने की हिदायत भी दी। मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व और अमित शाह की कुशल रणनीति और गुजरात के 48000 बुयों तक फैले अपने मजबूत सांगठनिक ढाँचे को देखते हुए बीजेपी गुजरात में जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रही है।

कहना गलत न होगा कि बीजेपी को इस बार के चुनाव में पहले के मुकाबले ज्यादा पसीना बहाना पड़ रहा है। यही कारण है कि बीजेपी ने इस बार मोदी के अलावा चार दर्जन अन्य केंद्रीय मंत्रियों को उतार दिया है। गुजरात में 22 सालों की एंटी इनकमबैंसी और राज्य में उभरे जातीय आंदोलन पटेल, दलित, ओबीसी उसकी जीत के राह में रोड़े की तरह खड़े हो गए हैं। राज्य में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी होने से उसकी काट निकलने में बीजेपी के पसीने हट रहे हैं और उसपर राज्यसभा चुनावों के बाद विधानसभा चुनावों में भी खरीदारी के आरोप लग रहे हैं। बीजेपी इसे कांग्रेस की साजिश बता रही है। खैर जो भी हो, इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि मोदी और शाह को अपना किला बचाने के लिए इस बार काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। फिर भी बीजेपी को मोदी और अपनी सांगठनिक क्षमता पर पूरा विश्वास है और उसे वह अपने जीत के दावे कर रही है।

सालों से गुजरात में वनवास झेल रही कांग्रेस पहले की तुलना में इस बार राहुल गांधी के नेतृत्व में आक्रामक और उत्साही नजर आ रही है। वह बीजेपी के खिला उपजे असंतोष को भुनाने की जुगत में है। इसके लिए वह पहले से सही हुई रणनीतियों के सहारे बढ़ने के प्रयास में है। गुजरात में राज के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को चुनाव प्रभारी बनाकर अपनी तैयारी शुरू कर दी। गहलोत ने खेमों में बनती गुजरात कांग्रेस को एकजुटता का सन्देश दिया, साथ ही सतह दबाब की राजनीति को ख़ारिज किया। शंकर सिंह वाघेला की मांगों को अनसुना कर देना कांग्रेस के बदले तेवर का परिचायक है। जिसका असर इस बार के चुनावों में दिखाई दे रहा है। जहाँ कांग्रेस पहले के मुकाबले एकजुट होके बीजेपी को बड़ी टक्कर दे रही है। बीजेपी के गुजरात विकास मॉडल को कांग्रेस ने निशाने पर लिया है कर उसे कुछ ख़ास लोगों तक सीमित बता रही है। जिसका जिक्र राहुल गांधी अपनी रैलियों में करना नहीं भूलते। बीजेपी के विकास को टारगेट करते हुए ‘विकास पागल हो गया है’ का नारा दिया है। जो सोशल मीडिया में टॉप ट्रेंड होने के साथ लोगों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। बीजेपी के हाई हिंदुत्व के बरक्स कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व को अपनाया है। राहुल गांधी ने गुजरात के दौरे की शुरुआत द्वारका मंदिर से की, साथ ही साथ अन्य मंदिरों में भी माथा टेक रहे हैं। जिसे कांग्रेस की सॉफ्ट हिंदुत्व की नीति के रूप में देखा जा रहा है। यहाँ तक की राहुल गांधी साल २००२ के दंगों तथा अल्पसंख्यकों का अपनी रैली में जिक्र करने से भी बच रहे हैं।जिससे बीजेपी भी चौंकी हुई है। बीजेपी के धर्म के कार्ड का काट के लिए कांग्रेस ने जाति का कार्ड भी खेला है।

गुजरात में उभरे जातीय आंदोलनों में वह अपना भविष्य देख रही है। जिसमें वह काफी हद तक सफल भी होती दिख रही है। 16% पाटीदार,59% ओबीसी और 7% दलित गुजरात में निर्णायक साबित हो रहे हैं। इसलिए कांग्रेस इसे अपने लिए एक अवसर के रूप में देख रही है। दीपावली के बाद पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, ऊना कांड के बाद दलितों के हीरों बन कर उभरे जिग्नेश मेवानी और प्रभावशाली ओबीसी वर्ग के अल्पेश ठाकोर को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का ऑफर देना उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है। जिसमें वह काफी हद तक सफल होती दिख रही है।अल्पेश ठाकोर कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी भले ही अब तक कांग्रेस में शामिल न हुए हो, परन्तु बीजेपी के खिलाफ लगातार विरोध का झंडा बुलंद किये हुए हैं। दरअसल कांग्रेस की कोशिश इन तीनों युवा नेताओं के साथ मिलकर बीजेपी के खिलाफ गठबंधन खड़ा करने की है। जिससे गुजरात की बाजी जीती जा सके। गुजरात में बीजेपी का एक बड़ा वोट बैंक व्यापारी वर्ग है। नोटबानी और जीएसटी ने छोटे व् माध्यम वर्ग के व्यापारियों की हालत खराब हो गई है। सूरत में कपड़ा व्यापारियों ने जीएसटी के खिलाफ कई दिनों तक आंदोलन किया। यही नहीं व्यापारियों ने “हमारी भूल कमल का फूल” नारा भी बुलंद किया। जाहिर है जीएसटी की विसंगतियों से व्यापारियों में काफी रोष है। जीएसटी में सुधार को भी गुजरात चुनाव के साथ जोड़कर देखा जा रहा है।

कांग्रेस ने गुजरात में नोटबंदी और जीएसटी को बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया है। राहुल गांधी अपने हर रैलियों में इसे लेकर सरकार पर हमला कर रहे हैं। उन्होंने जीएसटी को “गब्बर सिंह टैक्स” का नाम दे दिया। कांग्रेस गुजरात में बीजेपी को हर तरह से घेरने की कोशिश कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क के साथ पाटीदारों, ओबीसी और दलितों, आदिवासियों के मुद्दों को भी उठा रही है। 22 सालों से सत्ता में होने के कारण बीजेपी बचाव की मुद्रा में हैं और कांग्रेस हमलावर है। राहुल गांधी की रैलियों में उमड़ रही भीड़ से उत्साहित कांग्रेस उस वार कांग्रेस सत्ता बदलने का दावा कर रही है।उनका नारा है: कांग्रेस आ रही है, नई व्यवस्था ला रही है। ये बात सही है कि राहुल अपने बदले अंदाज़ में मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिशें कर रहे हैं। राहुल का ये बदला अंदाज़ जनता को लुभाने के साथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भी जोश भर रहा है। विश्लेषक इसे राहुल गाँधी के अमेरिका दौरे के बाद उनका दूसरा अवतार भी मान रहे हैं। लेकिन सवाल यही है कि सांगठनिक ढाँचे वाली कांग्रेस उमड़ रही भीड़ को वोटों में तब्दील कर पायेगी ? जनता के असंतोष को भुना पाएगी ? गुजरात में स्थानीय नेतृत्व न होना भी उसकी संभावनाओं पर असर डाल रहा है। गुजरात में उपजे असंतोष, नोटबंदी और जीएसटी पर आक्रामक रणनीति, सामूहिक नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों के सहारे कांग्रेस न केवल अपनी जीत की संभावनाओं पर बल दे रही है, बल्कि इस बार के चुनाव को भी काफी रोचक बना दिया है। इसके अलावा गुजरात को लेकर कुछ और कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य भी हैं, जो गुजरात की हवा का रुख बदलने की ताकत रखते हैं।

गुजरात में बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोटों का अंतर 10% रहा है है। बीजेपी का मत प्रतिशत 48 और कांग्रेस का 38 फीसदी रहा है। लेकिन इनके बीच सीटों का बंटवारा काफी रहा है। अगर बीजेपी अपने मत प्रतिशत को बरकरार रख पाती है तो गुजरात की तस्वीर वही होगी वर्तमान में है। पर इस बार बीजेपी को इसे बरकरार रख पाना चुनौती से कम नहीं है। बीजेपी के वोट बैंक, व्यापारी, पटेल वर्ग में काफी नाराजगी हैं, जिसमें कांग्रेस सेंध लगाने की फ़िराक में हैं। कांग्रेस की वोटबैंक में ६ फीसदी की बढ़ोतरी गुजरात में सत्ता परिवर्तन कर सकती है। ये बहुत ज्यादातर चुनाव के अंतिम दिनों की रणनीतियों पर निर्भर करता है। सूरत में पाटीदारों का अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी और व्यापारियों की नाराजगी तो इसी की आहट दे रही है। इन सब के बावजूद बीजेपी के पास मोदी के रूप में हुकम का इक्का है ,जो हर बाजी को पलटने की हिम्मत रखता है।

ये भी एक सच है कि गुजरात में इस बार पचास लाख नए मतदाता है, जिनकी पैदाइश 1995 के बाद की है। जिन्होंने गुजरात में बीजेपी के अलावा किसी और की सत्ता देखी ही नहीं। जिनके सामने गुजरात का भोगा हुआ विकास और बताया हुआ विकास है। ये युवा भी गुजरात की विसात में बाजी पलटने का मादा रखते हैं। कांग्रेस इन्हे अपने लिए आशा की तरह देख रही है। कांग्रेस राज्य में युवाओं की शिक्षा और रोजगार का मुद्दा उठा रही है।
गुजरात के आंदोलनों में युवाओं का असंतोष साफ़ झलकता है। जिसे आप हार्दिक-जिग्नेश-अल्पेश की तिकड़ी में भी देख सकते हैं। जाहिर है- कुछ कारण अब अपने उफान पर है, जहाँ बीजेपी अपना वोट प्रतिशत बचाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रखी है। वहीँ कांग्रेस अपने वोटों में ६ फीसदी की बढ़ोतरी कर गुजरात की चाबी अपने हाथ में लेने को उत्सुक दिख रही है। जिसपर सीटों के खेल का भविष्य टिका हुआ है। देखना यही है कि गुजरात की अंतिम बाजी किसके हाथ होगी ? परिणाम चाहे जिसके पक्ष में भी हो। इतना जरूर है की इसकी गूँज २०१९ में देश में जरूर सुनाई देगी। सही मायनों में गुजरात का चुनाव देश के राजनीतिक भविष्य की भी सूचना देगा।

शैलेश शुक्ला
(लेखक के विचार निजी हैं)

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