मौलाना तारिक जमील साहब ने बताया हजरत-ए-हाजरा का किस्सा, सुनकर आपके आँख में आंसू आ जायेगा

December 14, 2018 by No Comments

मित्र के बाद शाह ने अपनी बेटी दी, वापस आए औलाद एक भी नहीं थी दो बीवीया थी फिर भी कोई औलाद नहीं ।86 बरस की उम्र हो गई। दुआ मांगते मांगते मांगते 60 साल बाद अल्लाह ने दुआ कुबूल की और एक बेटा दिया। जिसका नाम था इस्माइल। और अभी वह कुछ ही दिन के थे की तभी इशारा हुआ अल्लाह की तरफ से ही अब निकल जाओ अल्लाह ने सारा के दिल में डाल दिया (बड़ी बीवी) वह कहने लगी कि इसको मेरी आंखों के सामने से ले जाओ.
सबने सोचा कि यह सौतन पना है। जिब्राइल भी आ गए उन्होंने कहा कि जैसा यह कह रही है वैसा ही करो इसे ले जाओ, तब सामने से सवाल हुआ या अल्लाह मैं इसे कहां लेकर जाऊं आवाज आई जहां मैं कहूं वहां ले जाओ।कायनात की ज़िंदगी मे पहली दफा जिब्राइल इंसानी शक्ल में ऊंट पर बैठ कर आय। आगे आगे जिब्राइल और पीछे पीछे इब्राहिम। बच्चा और बेगम साथ में ।बेगम भी हाजरा,20 -22 साल उम्र, अगर सारा को बेटा हुआ होता तो भी चल जाता.

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क्योंकि सारा 80 साल की हो गई थी जो औरत अपनी जिंदगी गुजार चुकी है उसे उसकी औलाद से जुदा करना आसान था लेकिन हाजरा तो अभी 20- 22 साल की ही थी। चलते चलते हफ्ते गुजरे दिन गुजरे महीने गुजरे लेकिन जब मक्का की वादी में पहुंचे जहां न इंसान ना पेड़ ना खाने की चीजें तरफ पहाड़ी। चारों तरफ पहाड़ और बीच में एक बच्चा.
जिब्राइल ने कहा यहां अपने बच्चे और बीवी को उतार दे और वापस चले जाय।जब आग में डाला था तो एक लफ्ज़ नहीं बोले थे एक तरफ हवा का फरिश्ता दूसरी तरफ पानी का,दोनों बोले कि क्या हम मदद करे?उन्होंने मन कर दिया बोले नहीं ,तम्हारी ज़रूरत नहीं,अल्लाह देख रहा है अगर उसे बचाना होगा तो बचा लेगा और मरना है तो मार देगा।और खामोशी के साथ आग की तरफ जा रहे हैं.

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उस खतरनाक आग के सामने कुछ नहीं बोले सिर्फ एक बात की हस्बियल्ला व निमल वकील मतलब तेरे ही सिपुर्द हर शै है ए मेरे अल्लाह।जब जिब्राइल ने कहा कि बचे को यहाँ छोड़ दो तो वो सोच में पड़ गए कि यहाँ कैसे छोड़ दूं?यहाँ तो न इंसान है ना खाना है ना पानी है।आपने कहा यही छोड़ दो ये अल्लाह का हुक्म है क्योंकि इसी बच्चे की पुश्त से हमारे आखरी नबी आयंगे.
अल्लाह का हुक्म है ये सुन कर वो तैयार हो गए।जब वो वापस मुड़े तो हाजरा हैरान हो गई क्योंकि वो तो नबी नहीं थी न वो तो एक शहज़ादी थी।चलते चलते कुदई पहुंचे जब काफी दूर चली आई तब उन्होंने पूछा कि क्या ये अल्लाह का हुक्म है तब उन्होंने कहा कि हाँ।अभी तक हाजरा एक मां बन के सोच रही थी लेकिन अब वह एक मोमिना बन कर सोचने लगी फिर उन्होंने कहा कि ठीक है ले जाओ.

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इब्राहीम जब पहाड़ से नीचे उतरे तो उन्होंने ऊंट से छलांग लगा दी औऱ हाथ उठा कर अल्लाह से दुआ की।उस काली पहाड़ियों में अकेले हाजरा और उनकी औलाद न पानी न रौशनी बच्चे ने एड़ियां रगड़ी तब जम जम निकल और पानी नसीब हुआ. ऐसा इम्तेहान,ऐसा सब्र,ऐसी थी हज़रत हाजरा.बच्चे का तड़पना देख कर वो एक पहडी से दूसरी पहाड़ी जाती ।7 चक्कर के बाद वो बेबस हो कर गिर गई ओर आखरी नज़र बेटे को देखना चाहा ये सोच कर की अब वो भी मर जायेगा और मैं भी।तब जा कर जम जम नाज़िल हुआ.

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