क्यूँकि मुझे बचपन के नाम पर इन अच्छी यादों से ज़्यादा बुरी यादें घेर लेती है..

January 19, 2018 by No Comments

*ये आर्टिकल किसी महिला के साथ हुआ पर्सनल इंसिडेंट है. हमारी पालिसी है, किसी शख़्स की आइडेंटिटी को पब्लिक नहीं किया जाएगा, जिसके तहत इसमें नाम को गुप्त रखा गया है*

नहीं लौटना मुझे बचपन में…बचपन हर इंसान के लिए ख़ास वक़्त होता है…खेलकूद, बेफ़िक्री, स्कूल, दोस्ती और भी न जाने क्या-क्या यादें जुड़ी होती हैं बचपन से, कोई व्यक्ति जीवन के किसी भी पड़ाव में हो उससे अगर पूछा जाए कि वो ज़िंदगी का कौन-सा वक़्त वापस जीना चाहता है। अधिकांश लोगों का जवाब होगा…बचपन। पर इस सवाल पर मेरा ये जवाब न कभी था…न कभी होगा, क्यूँकि मुझे बचपन के नाम पर इन अच्छी यादों से ज़्यादा बुरी याद घेर लेती है।

घर के पास के ही एक पहचान वाले अंकल चुनाव लड़ रहे थे हम सभी बच्चे किसी राजनीति को समझते तो नहीं थे, पर उन अंकल के लिए ज़ोर- शोर से प्रचार में निकल जाते थे और ढेर सारे नारे लगा आते थे. ऐसे ही तो किसी भी भेदभाव और पक्ष से परे होता है बचपन। एक रोज़ जब हम प्रचार के लिए जाने वाले थे सब तैयार होकर गाड़ी में बैठे, हम सब जाते थे प्रचार में भाई-बहन, पास-पड़ोस के सभी, मुहल्ले के सभी बच्चे, हम सब तो थे ही कुछ बड़े भी थे और उसमें सबसे अच्छे थे एक भैया, जो अक्सर अंकल जी के ऑफ़िस आया करते थे और हम उन्हें बहुत अच्छे से पहचानते थे, मोहल्ले के ही थे वो।

बस उस रोज़ जब गाड़ी में बैठे तो मेरे लिए जगह ही नहीं हुई, कोई भी बच्चा मुझे जगह दे ही नहीं रहा था…सारे बच्चे एक लाइन से बैठ गए थे और मुझे जगह दी उस भैया ने अपने बाजू में…हमारी टीम बन गयी उसी टाइम। हम उन सबको चिढ़ा रहे थे कि अब मैं बड़े लोगों के साथ बैठी हूँ मैं ज़्यादा नारे लगाऊँगी…बस गाड़ी चली और सब चल पड़े। भैया ने मेरा हाथ अपने हाथ में ही रखा था। अचानक मुझे एहसास हुआ कि मेरा हाथ किसी अनजानी-सी चीज़ से छुआ जा रहा है।

घबराकर हटाने की कोशिश की तो पता चला कि हाथ भैया ने इस तरह से पकड़ा हुआ था कि मैं हाथ हटा ही नहीं सकती। पता नहीं सब सामने बैठे थे, सारे बच्चे और उन्होंने कैसे तो मेरा हाथ शायद अपनी जेब से लेकर अंदर कर लिया था। वो अपनी हरकतें कर रहे थे। मुझे तो कुछ समझ भी नहीं आ रहा था बस ये पता था कि जो भी है ठीक नहीं है। लेकिन मैं उस समय जड़ सी हो गयी थी और कुछ भी नहीं कर पा रही थी, जो हो रहा था वो मुझे समझ नहीं आ रहा था…और अचानक मेरे हाथ में चिपचिपा-सा कुछ महसूस हुआ…मैंने हाथ खींचा और वो बाहर आ भी गया। 

अब भी वो मेरे बाजू में ही बैठे थे, मुझे समझ नहीं आ रहा था कुछ…छोटे-से मन में कितना कुछ चल रहा था। लग रहा था सामने बैठे किसी ने कुछ देखा तो नहीं, ये विचार कैसे तो बचपन से लड़कियों के साथ रहता ही है, मुझे लग रहा था किसी ने अगर देखा होगा तो मेरा कितना मज़ाक़ उड़ाएगा। अपना हाथ तो मैंने ख़ुद से भी दूर ही रखा था, वो मेरा लग ही नहीं रहा था…अपरिचित-सा था वो हाथ मेरे लिए।

नारे तो उस दिन एक भी नहीं लगाए मैंने, मन में ही इतना शोर था और मैं चुप थी। आते वक़्त न मैं उनके बाजू में बैठी न उन्होंने ही बिठाया और घर आकर मैंने अपना हाथ कई-कई बार धोया, फिर भी लगता रहा कि पता नहीं क्या है जो चिपक-सा गया है। उसके बाद कभी मैंने उनसे बात नहीं की वो जब भी नज़र आते मैं भाग जाती थी।  आज सोचती हूँ तो लगता है कि ऐसे जाने कितने लोग होंगे जो बच्चों को अपना निशाना बनाते हैं, मासूम बच्चों से उनका बचपन, उनकी अच्छी यादें छीन लेते हैं, न जाने उन्होंने मुझसे पहले कितनों के साथ ये किया होगा और न जाने मेरे बाद कितनों के साथ ये हुआ हो। समाज में लड़के-लड़कियों को बहुत छोटी उम्र में ही इस तरह के अनुभव हो जाना आम है, शायद ही कोई बच्चा ऐसा मिलेगा जिसके साथ कुछ न हुआ हो कभी।
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ऐसा अनुभव एक इंसान के जीवन में एक ही नहीं होता, मेरे साथ भी नहीं रहा, ऐसे कई बुरे अनुभव मिले जीवन में…बल्कि इससे ज़्यादा बुरे…पर बचपन के अनुभव मन पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं। ज़िन्दगी के किसी पड़ाव पर अगर आप या आपका कोई भी नज़दीकी इस सामाजिक बुराई का शिकार हुआ है तो हम आपसे अपनी व्यथा सांझा करने का अनुरोध करते हैं और साथ ही साथ आपकी निजी जानकारी की गोपनीयता बनाये रखने का वादा भी करते हैं। तो आइये अपने अंदर की झिझक को मिटा अपने विचार सांझे करें और इस समाजिक बुराई को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ें।
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इसके इलावा इस विषय पर आपके मन में उठ रहे सवालों का जवाब देने के लिए भी हम तत्पर हैं। अपने मन की बात और हमें ईमेल के जरिये इस पते पर भेज दीजिये। हमें आपके ईमेल का इंतजार रहेगा। ईमेल आईडी नीचे दिया गया है:

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प्रियंका शर्मा

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