आज़ादी दिवस विशेष: हमारे मदरसे में गाया जाता था राष्ट्रगान..

August 6, 2018 by No Comments

जब मैं छोटा था तो आज़ादी के दिन और गणतंत्र दिवस को लेकर ख़ासा उत्साह रहता था. हम सब स्कूल जाते वहाँ बूंदी के लड्डू मिलते और कुछ अच्छी बातें बतायी जातीं. जब तक इस्लामी दर्सगाह मदरसे में पढ़ा तो वहाँ इस दिन राष्ट्र गान गाया जाता और साथ में “लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी” गायी जाती| जब बड़े होकर हाफ़िज़ सिद्दीक़ इस्लामिया इंटर कॉलेज में पढने गया तो वहाँ राष्ट्रगान और क़ौमी तराना सुना|

इस वक़्त तक मुझमें आज़ादी के दिन को लेकर जो विशेष जगह बननी चाहिए थी वो बन चुकी थी लेकिन सही मायनों में आज़ादी क्या है ये तब पता चला जब आज़ादी के पीछे और आसपास के इतिहास को पढ़ा. मैं बार बार 1857 की क्रांति पढता और अफ़सोस में डूब जाता कि हमारी हार कैसे हो गयी| मैं बार बार बेगम हज़रत महल कैसे अपने अवध को बचा ले जातीं ये कहानियां बुनता रहता. लगातार रानी लक्ष्मीबाई के बारे में सोचता कि वो कैसे हार गयीं. मंगल पांडे को लेकर एक क़िस्म का जज़्बा उठता था लेकिन कहीं ना कहीं ये लगता था कि उन्हें प्लान से अलग नहीं जाना चाहिए था| मौलवी अहमदुल्लाह, नाना साहब, तांत्या टोपे, के बारे में और पढने का मन करता रहा लेकिन कुछ ख़ास मुनाफ़ा ना हुआ| शायद इससे भी ज़्यादा और भयानक दुःख था बहादुर शाह ज़फ़र की हार और उसके बाद उनका रंगून में क़ैदी की ज़िन्दगी गुज़ारना रहा| इस दरम्यान उनका एक शे’र मेरे सीने से लिपट गया- “ग़ाज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख़्त ए लन्दन तक चलेगी तेग़ हिन्दुस्तान की” बहरहाल, इसके पीछे जाकर सेरिरंगापत्तम में टीपू सुलतान की हार ने भी लगातार मुझे दुःख दिया|

इस ग़म के दौर ने मुझसे ऐसी दोस्ती की थी कि मैं बजाय वक़्त को आगे ले जाने के उसी में बंधा रहता. कुछ महीनों बाद मैंने गुज़रे वक़्त की गलियों पर क़दम आगे बढाए और आज़ादी के क़रीब आ पहुंचा. इस दौर में वो हार जीत वाला मामला नहीं है. इस दौर में अगर कहीं बड़ा ग़म है तो वो जलियाँवालां बाग़ नरसंहार है, उसके बाद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान जैसे क्रांतिकारियों के किस्से लेकिन इसी दौर में एक और महान नेता चले| चितरंजन दास मेरे सबसे पसंदीदा नेताओं में से एक रहे हैं, सही मायनों में आज़ादी के ठीक मायने चितरंजन दास और डेरोज़ियो ने ही मुझे समझाए, डेरोज़ियो ने तो जब बात उठायी तब बात ही इतनी नयी थी कि उनके साथ ज़्यादा लोग नहीं आ सके लेकिन दास ने ये कोशिश की कि जितनी भी आज़ादी मिले वो ले लो क्यूंकि अगर बिलकुल आज़ादी नहीं होगी तो कुछ नहीं होगा जिसकी वजह से उन्होंने स्वराज पार्टी बनायी तब कांग्रेस ने उनके विचारों का विरोध किया लेकिन बाद में कांग्रेस ने भी माना कि पूर्ण स्वराज से पहले भी कुछ मिल रहा हो तो ले लेना चाहिए|

थोडा आसपास अगर जाएँ तो सरोजनी नायडू, ऐनी बेसेंट, गोपाल कृष्णा गोखले,रबिन्द्र नाथ टैगोर, मौलाना मुहम्मद अली जौहर, मौलाना शौकत अली, हकीम अजमल ख़ान, जैसे क़द्दावर नेता कुछ ना कुछ शिक्षा मानव जाति को देते रहे| जवाहर लाल नेहरु ने जो बयान आज़ादी मिलने के बाद दिया वो तो मशहूर ही है लेकिन मुझे नेहरु 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज दिवस मनाये जाने की वजह से ज़्यादा याद रहते हैं| रेड शर्ट मूवमेंट वाले ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान हों या भुलाभाई देसाई सबका एक बड़ा स्थान है|

महात्मा गाँधी ने आज़ादी के दिशाहीन आन्दोलन को एक दिशा दी और लगातार देश को समझने की कोशिश की| अपनी जान की क़ुर्बानी देकर उन्होंने भारत की बची-खुची एकता को बचाया था| सुभाष चन्द्र बोस, बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने कुछ अलग रास्ते चुने आज़ादी के लिए जिसमें बोस का रास्ता क्रांतिकारी था तो आंबेडकर का रास्ता सामाजिक आज़ादी के संघर्ष को बुनियाद देने का था| बाबा साहब ने आज़ादी के लिए तो काम किया ही लेकिन उन्होंने जो काम 1920 और 1930 के दशकों में किया उसकी वजह से ही दलितों को आज़ादी के बाद हक़ मिले और सामाजिक न्याय की बात हुई| हालाँकि संविधान में दिए गए ये हक़ कितने मिल पा रहे हैं इस पर पूरी बहस है लेकिन जो कुछ भी है वो उन्हीं की वजह से ही है|

(ये सिर्फ एक हिस्सा है..आगे और बातें होंगी)

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अरग़वान रब्बही

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