जन्मदिन विशेष: आज़ाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री “मौलाना आज़ाद” ने दिया था लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा

November 11, 2017 by No Comments

कवि, लेखक, पत्रकार और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी ‘मौलाना अबुल कलाम आज़ाद” की याद में 11 नवंबर को देशभर में नेशनल एजुकेशन डे मनाया जाता है। इनका जन्म 11 नवंबर, 1888 को सऊदी अरब के मक्का में हुआ। मौलाना आज़ाद को शुरूआती शिक्षा उनके घर से ही मिली, जोकि इस्लामी तौर तरीकों से हुई। घर पर या मस्ज़िद में उन्हें उनके पिता तथा बाद में अन्य विद्वानों ने पढ़ाया। आज़ाद को पढ़ाई का बहुत शौंक था।

इस्लामी शिक्षा के अलावा उन्हें फिलॉसफी, हिस्ट्री और गणित की शिक्षा भी अन्य गुरुओं से मिली। आज़ाद ने उर्दू, फ़ारसी, हिन्दी, अरबी और अंग्रेजी़ भाषाओं में महारथ हासिल की। 16 साल में उन्होंने वो सारी शिक्षा हासिल कर ली थी जो आमतौर पर 25 साल में मिला करती थी।
भारत के आज़ाद होने के बार मौलाना आज़ाद ही देश के पहले शिक्षामंत्री बने। शिक्षामंत्री बनने के बाद उन्होंने देश की शिक्षा व्यवस्था में काफी सुधार किए। आज़ाद ने 11 साल तक शिक्षा मंत्री का कार्यभार संभाला। शिक्षा के क्षेत्र में बात करें तो उनके ही कार्यकाल में UGC और खड़गपुर में देश की पहली आईआईटी की स्थापना हुई।
आजाद ने स्कूल और कॉलेज निर्माण के राष्ट्रीय कार्यक्रमों के सृजन में मास्टरमाइंड की भूमिका निभाई। प्राइमरी एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने स्कूलों में बच्चों और युवाओं का नामांकन किया। भारत के पहले मंत्री शिक्षा के रूप में, उन्होंने ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब बच्चों और लड़कियों को शिक्षित करने पर जोर दिया।

उन्होंने केन्द्रीय शिक्षा संस्थान, दिल्ली की स्थापना की, जो आज दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग के रूप में “देश की नई शैक्षिक समस्याओं को सुलझाने के लिए एक शोध केंद्र” बना। उनके नेतृत्व में, शिक्षा मंत्रालय ने साल 1951 में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के पहले संसथान को स्थापित किया।
उन्होंने साहित्य और कला के क्षेत्र में संस्कृति को जोड़ने के लिए साल 1953 में संगीत नाटक अकेडमी, साल 1954 में साहित्य अकेडमी और ललितकला अकेडमी जैसे संस्थानों की स्थापना की।

मौलाना आज़ाद देश के विभाजन का विरोध करते थे। उन्होंने अल हिलाल नाम से पत्रिका को शुरू किया। जिसमें उन्होंने बतौर पत्रकार काम किया और औपनिवेशिक शासन पर जमकर प्रहार किया गया। उनका उद्येश्य मुसलमान युवकों को क्रांतिकारी आन्दोलनों के प्रति उत्साहित करना और हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देना था।
अन्य मुस्लिम नेताओं से अलग उन्होने 1905 में बंगाल के विभाजन का विरोध किया और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के अलगाववादी विचारधारा को खारिज़ कर दिया। उन्होंने ईरान, इराक़ मिस्र तथा सीरिया की यात्राएं की। आजाद ने क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना आरंभ किया और उन्हें श्री अरबिन्दो और श्यामसुन्हर चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारियों से समर्थन मिला। आज़ाद को साल 1992 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

 

 

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