नौजवानों का पलायन और विकास के खोखले मॉडल

November 9, 2017 by No Comments

बीते वर्षों में रेल की उपयोगिता में परिवर्तन आया है | जिन रेल गाड़ियों का काम कभी माल ढोने का हुआ करता था अब उनका मुख्य काम पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड से मजदूरों को मुख्य व्यापारिक केन्द्रों जैसे सूरत, अहमदाबाद, मुंबई, बंगलौर, लुधियाना, भटिंडा, दिल्ली, फरीदाबाद, गुडगाँव तक पंहुचाने का रह गया है | जब नौजवान 15 से 18 वर्ष की उम्र में रोटी की तलाश में घर से गठरी बाँध कर निकलता है और अपने नजदीकी रेलवे स्टेशन पर पहुँचकर घंटों बैठकर पूरब से पश्चिम जाने वाली ट्रेन का इन्तेजार करता है | और जब ट्रेन स्टेशन पर पहुंचती है तो वह देखता है कि 4-5 डिब्बे ए०सी० के लगे होते हैं कुछ स्लीपर के तथा आगे और पीछे 2-2 डिब्बे सेकेंड क्लास के होते हैं, जिसे कठइया डिब्बा भी कहा जा सकता है, जिसमे उन्हें बैठने के लिए बड़ी जंग लड़नी पड़ती है और पेट की भूख 90 सीटों की क्षमता वाले कठइया डिब्बे में ऊपर-नीचे तथा लटककर कम से कम 300 लोगों को बैठने को मजबूर करती है | गेट पर लटकने वालों की जान जोखिम में बनी रहती है | पूरे ट्रेन की यात्रियों की संख्या की गिनती कर दी जाय तो चार डिब्बो में बैठने वालों की संख्या बाकी पूरे ट्रेन की संख्या से कही ज्यादा होती है | और जो वैशाली बरौनी से दिल्ली, पुष्पक लखनऊ से मुंबई और अन्य ट्रेने जो पूरब से पश्चिम को जाती हैं, इस पर बैठने के लिए प्लेटफॉर्म पर अपना बैग लेकर सुबह से ही लाइन में खड़ा होना पड़ता है जी.आर.पी की गालियाँ और डंडे भी खाना पड़ता हैं और कैदियों की तरह से लाइन से ही डिब्बे में घुसना पड़ता है |

वही एक तबका जो ए०सी० और स्लीपर में बैठता है, ट्रेन छूटने के कुछ क्षण पहले आता है और सैकड़ों की सुविधा को अकेले भोगता है | इन जनरल डिब्बे में नौजवानों की यात्रा 24 से 50 घंटे तक की होती है | वे जिस हालत में बैठते हैं, उसी हालत में यात्रा पूरी करते हैं | टट्टी पेशाब भूल जातें हैं और रास्ते में पानी और भोजन भी नही नसीब होता | रास्ते में रेल के महंगे सामान इस्तेमाल नही कर सकते क्यूंकि ब्याज पर पैसे लेकर अपनी यात्रा शुरू करते हैं | ट्रेन छोड़ते ही पेट की भूख इनके मान सम्मान, स्वाभिमान और सारे अधिकार ख़त्म कर देती है और किसी भी शर्त पर ढाबे से लेकर फक्ट्रियों तक अनगिनत घंटे काम और बिना किसी न्यूनतम मजदूरी की सीमा के, गिरमिटिया से भी बदतर स्थिति में काम करते हैं | इस व्यवस्था से उद्योगपतियों को सस्ते से सस्ते मजदूर मिल जाते हैं जिससे उनके मुनाफे में अकूत वृद्धि हो जाती है | साथ ही उन ट्रेड सेण्टर पर एक नए किस्म का कारोबार पनपा है अभी तक ठेकेदार वस्तुओं की पूर्ती के ठेकेदार हुआ करते थे मगर अब ढाबे, भवन निर्माण, सरकारी संस्थानों में तथा छोटे बड़े सभी उद्योगों में मजदूरों की पूर्ती का कारोबार भी ठेकेदारों के हाथ में चला गया हैं जिससे उनके सभी सार्वभौमिक अधिकार जैसे जीने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया हैं | जिस वजह से एक सशक्त नौजवान गिरमिटिया के तौर पर (जिसकी कोई सामाजिक सुरक्षा के नहीं होती) शहर के गली कूंचो में मारा मारा फिरता है |

मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूँ की भारत में पुर्तगाली, फ़्रांसिसी और अंग्रेजों ने जिन व्यापार केन्द्रों को स्थापित किया था आज भी लगभग वही व्यापारिक केंद्र जीवित हैं और बीच-बीच में थोडा बहुत क्षेत्रीय स्तर पर छोटे-छोटे व्यापारिक केंद्र स्थापित हुए थे जो की क्षेत्रीय कृषि उत्पाद आधारित उद्योग थे | उधोगपतियों और सरकार की मिलीभगत से जो आर्थिक नीतियाँ तय हुईं उसमे क्षेत्रीय व्यापार केंद्र पूरी तरह नष्ट कर दिए गए और मुख्य रूप से १९८९ के बाद बड़े पैमाने पर यह घटना घटित होती है | मंडल और कमंडल की राजनीति का भी इसमें मुख्य योगदान है, साथ ही पूरब के विनाश का कारण सत्ता का पश्चिम में केन्द्रीकरण भी है अगर हम उत्तर प्रदेश का उदाहरण ले तो जिसके सूत्रधार कल्याण सिंह जी, मुलायम सिंह जी और मायावती जी हैं जिन्होंने कभी भी राजनीति को युवाओं, किसानों, मजदूरों, छात्रों एवं महिलाओं को उनकी मूलभूत जरूरतों के लिए पारंपरिक स्थापित रोजगारों से जुड़ने नही दिया, इनको बहस से बाहर करके जाती और धर्म को बहस के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया जो अफीम का काम किया और यहाँ का पिता अपने परदेश में मजदूरी करने वाले बेटे की फिक्र भूल गया |

मैं ये कहना चाहता हूँ कि 20वीं सदी के शुरूआती दौर में नजर डालें तो पाएंगे की उत्तर प्रदेश बिहार की सीमा पर देवरिया, जो कभी चीनी का कटोरा था, 1903 में पहली गन्ने की मिल बैतालपुर देवरिया सुगर मिल और 1921 में भटनी सुगर मिल स्थापित हुई थी जिसकी जमीन किसानों ने पट्टे पर दी थी इसके साथ ही आजादी से पहले कुल 14 चीनी मिले देवरिया जनपद में स्थापित हुई थी | और इस तरह देखा जाये तो गन्ना उत्तर प्रदेश में नगदी फसल के रूप में स्थापित हुआ और छोटे छोटे व्यापरिक केंद्र जैसे मऊ, बनारस, भदोही, मिर्जापुर, टांडा, गोरखपुर, मगहर, सहजनवां, खलीलाबाद, बस्ती, गोंडा, आदि हथकरघा, साडी कपडा, कालीन सीमेंट के लिए जाने जाते थे जिन्होंने लाखों स्थानीय मजदूरों के हाथ में रोजगार दिया था और किसानो के उत्पाद ही मुख्य कच्चे माल के रूप में काम आते थे | 1989 के बाद बहुत तेज़ी से इन उद्योगों का विनाश शुरू हुआ और सभी मिलें और उद्योग केवल बच्चों को किताब में पढ़ने के लिए मौजूद है | मजदूरों के हाथ खाली हो गए और किसानों की हालत खराब हो गयी, स्थानीय स्तर पर रोजगार ख़त्म हो गया और यहाँ के नौजवान ट्रेनों में लादकर ट्रेड सेण्टर पर पहुंचाए जाने लगें | उत्तर प्रदेश से लेकर के बिहार, झारखण्ड, असम क्षेत्रों का बड़ा भू भाग खाली हो गया | थोड़े बहुत बचे नौजवान क्षेत्रीय शहर के लेबर चौराहों पर खड़े होते हैं जहाँ केवल कालोनियां बसाने के लिए मजदूरों की जरुरत पड़ती है, वह भी बस कुछ मजदूरों को ही खपा पाती है बाकी अपने गाँव वापस लौट जाते हैं | गाँव में बचे हैं तो सिर्फ बेसहारा मां बाप वह भी पश्चिम की तरफ मूंह उठा कर ताकते हैं की मेरा बेटा पैसे भेजेगा तो उनकी दावा और रोटी का इंतज़ाम हो सकेगा | इस गाँव प्रधान और किसान प्रधान देश ने अब मेट्रो सिटी के असंतुलित विकास में गाँव को निगल लिया हैं |

अब संसद और विधानसभा में इन पलायित मजदूरों, नौजवानों, किसानों, उजड़ते गाँवों पर चर्चा नहीं होती बल्कि बुलेट ट्रेन, मेक इन इण्डिया, स्किल्ड इण्डिया, स्टार्टअप और चुनावी जुमले उछालकर एक महीना संसद को बंधक बना कर पूंजीपतियों के हवाले कर दिया जाता है | अब चर्चा होती है देव दिवाली की, त्रेता युग की दिवाली की, लव जेहाद की | अब चर्चा होती है मंदिर मस्जिद की, धार्मिक जुलूस निकालने की | इस बात की चर्चा अब ज्यादा होती है की सरकारी इमारतों की दीवारों का रंग क्या होगा, चर्चा है स्वच्छता अभियान और गंगा सफाई की और देश परदेश का बड़ा बजट और तंत्र भी इन चर्चाओं में खप जाता है | यहाँ कभी चर्चा नही होती किसानों की आत्महत्याओं पर, युवाओं के पलायन पर, कृषि उत्पाद की खरीदारी एवं मूल्य निर्धारण पर, गन्ना के बकाये के भुगतान पर, कुपोषण से निजात पर, गरीबी और भुखमरी पर, छात्रों की बढती समस्याओं और शिक्षा के गिरते स्तर पर |

चूँकि मैं इन सारी बातों को उन नौजवानों के पलायन के कारण में देखता हूँ और इस व्यस्था को आगाह करना चाहता हूँ की सकल घरेलु उत्पाद की विकास दर के डाटा से इन समस्याओं का समाधान संभव नही है | और अगर मोदी जी और अरुण जेटली जी बैंको को उबारने के लिए २ लाख ११ हज़ार करोड़ देते हैं और शेयर बाज़ार में उछाल आता है और बाज़ारों में रंगत दिखती हैं तो पैसा किसके पास जाता है या सीधे कहा जाये तो एन.पी.ए. के बदले में इन पैसों का भुगतान सरकार करती है | जब मोदी जी का गुजरात माडल ढहता है तो साफ़ है की जिस विकास की बात मोदी जी कर रहे थे वह और कोई नही बल्कि वही अंग्रेजों द्वारा स्थापित बड़े व्यापार केन्द्रों पर आधारित माडल है जिनके कारण देश का नौजवान पलायन करता हैं | लेकिन हम भूल जाते हैं की बाहर का पहुंचा हुआ नौजवान बिना शर्त मजदूरी करने को हाज़िर है तो स्थानीय नौजवान बेरोजगारी और भूखमरी की कगार पर निश्चित ही जायेगा, और ऐसा ही हुआ | मुझे यह कहने में कत्तई गुरेज़ नही है की मोदी जी ने गुजरात चुनाव जीतने के लिए अब विकास का नही बल्कि 1 लाख 10,000 करोंड़ रुपये जापान से क़र्ज़ लेकर गुजरात के आधे प्रतिशत लोगों से भी कम के हित साधन के लिए बुलेट ट्रेन चलाने की कोशिश की है जिसका भुगतान देश के 125 करोंड़ गरीब, किसान-मजदूर से कर वसूल कर करनी होगी | इसलिए मैं ये कहना चाहता हूँ की 21 करोड़ की आबादी का यह प्रदेश जिसके बहुतायत हिस्से में छोटे छोटे उद्योग बंद हो गए, मिले बेच दी गयी वह 1 लाख 10 हज़ार करोड़ रुपये से इन केन्द्रों को जीवित कर दिया जाता तो उसकी सार्थकता सिद्ध होती और पलायन निश्चित ही कम हो सकता था | बैंको को उबारने के बजाय मोदी जी किसानो को पूर्णतया कर्ज मुक्त कर देते, उनका उत्पादन बढ़ जाता, तो ये ट्रेने मजदूर ढोने के बजाय माल ढोती, जिससे इन इलाकों में माल के बदले दाम आता और अर्थव्यवस्था सर के बजाय पैर के बल बल खड़ी हो जाती | वैसे तो आगे एक बड़ा खतरा दिखता है, की ये पलायित बेरोजगार युवा इन बड़े ट्रेड सेंटर पर इकठ्ठा होते हैं तो वो दिन दूर नही की इनके खाली हाथ इस व्यवस्था को चैन से जीने देंगे |

शिवाजी राय,
किसान नेता,
गन्ना किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा, उ.प्र

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *