मक्का में लोग शैतान को पत्थर क्यूँ मारते हैं? जाने 4000 साल पहले इतिहास में क्या हुआ था…

January 16, 2019 by No Comments

दोस्तों इस्लाम में निष्ठा तो दिखती है साथ ही यह धर्म अपने नियम एवं कानूनों के लिए भी जाना जाता है ।यहां हज करने के लिए भी कुछ नियम है जिसे हर मुसलमान को मानना होता है। हज यात्रा को भी इस्लाम के विभिन्न नियमों में से एक कहा जाता है यदि आप ध्यान से जानेंगे तो आपको यह पता चलेगा कि हज यात्रा इस्लाम के विभिन्न स्तंभों में से एक है। इसे मुसलमान अपनी इबादत के माध्यम से मानते हैं.
दोस्तों हज यात्रा में शैतान को पत्थर मारने की रसम आज भी चली आ रही है माना जाता है कि इस रस्म को अदा किए बिना हज यात्रा अधूरी होती है. दोस्तो हज यात्रा में शैतान को पत्थर मारने की रस्म के पीछे एक रोचक कहानी है, कहा जाता है कि एक बार अल्लाह ने हजरत इब्राहिम से उनकी सबसे पसंदीदा चीज को मांगा.

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हजरत इब्राहिम का एक ही बेटा था जिनका नाम इस्माइल था हजरत इब्राहिम का यह बेटा काफी बुढ़ापे में हुआ था और यही वजह है कि वह स्माइल को बेहद प्यार करता था। लेकिन क्योंकि अल्लाह का हुक्म था इसलिए वह अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए हजरत इब्राहिम जिस वक्त अपने बेटे को लेकर कुर्बान करने जा रहे थे तभी उनको रास्ते में एक शैतान मिला.
उस शैतान ने हजरत इब्राहिम से कहा कि वह क्यों इस उम्र में अपने बेटे को कुर्बान कर रहे हैं अगर आप ने अपने बेटे को कुर्बान कर दिया तो उसके मरने के बाद आप की देखभाल कौन करेगा वैसे भी आप इतने बुरे हो चुके हैं। और शैतान की बात को सुनकर हजरत इब्राहिम उसकी कही बातों को सोचने लगे और भावनाओं में डूब गए.

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हजरत इब्राहिम सोच में पड़ गए और उनके कदम डगमगाने लगे लेकिन बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपने आप को संभाला और खुद को समझाया कि अल्लाह के फरमान से बढ़कर कुछ नहीं होता है जैसे तैसे वह अपने आप को संभालते हुए कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए और आगे बढ़ गए भावनाएं आगे ना आए इसके लिए उन्होंने कुर्बानी से पहले आंखों पर पट्टी बांध ली और जैसे ही उन्होंने अपना काम पूरा किया फिर उन्होंने अपने आंखों की पट्टी खोली तो वह हैरान रह गए.
उन्होंने देखा कि उनका बेटा सामने खड़ा है और जिसकी बनी उन्होंने भी है वह एक दुम्बा था। ऐसी कहानी को आधार मानकर आज भी इस्लाम में बकरा ईद मनाई जाती है और यही कारण है कि मुसलमान आज भी हज यात्रा में आखिरी दिन बकरा ईद पर कुर्बानी देने के बाद उस शैतान को पत्थर मारते हैं जिसमें हजरत इब्राहिम को बहकाने की कोशिश की थी। उस घटना के बाद आज तक यह प्रथा चली आ रही है और आज भी हज यात्रा शैतान को पत्थर मारने की रसम के बिना अधूरी मानी जाती है.

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