“जैसे झूठ बोलकर भारत में शादी हो जाती है वैसे ही चमचागिरी करके कुलपति बन जाते हैं”

अभी जो कुछ बी हिन्दू यू में हुआ वो अविस्मरणीय है। लड़कियाँ छेड़छाड़ रोकने के लिए शिकायत लेकर गयीं तो वाइस चांसलर साहब कहने लगे कि कॉलेज परिसर में से राष्ट्रवाद ख़त्म नहीं होने दिया जायेगा। ऐसे स्पष्टवादी इंसान को तो नोबल मिलना चाहिए। ये तो त्रिपाठी जी हैं जो ऐसा कह सकते हैं वरना और कोई ये कह दे कि लड़की छेड़ना राष्ट्रवाद है तो उसे पाकिस्तान के अफगानिस्तान बॉर्डर से पहले कहीं सर छुपाने को जगह न मिले।

वैसे त्रिपाठी दिलचस्प आदमी लग रहे हैं। वीसी वैसे होते ही दिलचस्प हैं। वाइस चांसलर का हिंदी अनुवाद करने वाले ने कुलपति किया है। जिसने भी हिंदी में ऐसे शब्दों का ईजाद किया होगा उस भाई की शादी की फ़ाइल शायद कही अटक गयी होगी। पति बनने की प्रबल इच्छा में राष्ट्र से लेकर कॉलेज तक हर जगह पति बिठा दिए। सेना पति , राष्ट्र पति , अब कुल पति। खैर जो भी हो कुलपति अपने पति होने की भूमिका बरोबर निभा रहे है। अनपढ़ के हाथ में कलम आने का ये नुकसान है अनाप शनाप बकने लगता है। मेरे मन में एक और ख्याल आया है कि शायद वाइस चांसलर को हिंदी में इसलिए कुलपति कहा जाता है कि जैसे पति होने के लिए भारत में कोई खास योग्यता नहीं होती सिवाय मर्द होने के, वैसे ही कुलपति के लिए भी सवर्ण होने के सिवाय और कुछ नहीं चाहिए होता। जैसे घर में पति कुछ नहीं करता वैसे ही कुलपति के पास भी करने को कुछ नहीं होता। जैसे सच झूठ बोलकर भारत में शादी हो जाती है वैसे ही चमचागिरी करके कुलपति बन जाते है।

हरिशंकर परसाई जी ने अपने लेख ” लंका विजय के बाद ” में कुलपति की कितनी मार्मिक तस्वीर प्रस्तुत की है। लंका विजय के बाद जब सब बंदर कुछ न कुछ पद लेने को आतुर थे तो एक बंदर से उसकी पत्नी ने पूछा कि तुम कौन सा पद लोगे…

“” वानर ने कहा ,’ प्रिय , मैं कुलपति बनूगा। बचपन से ही शिक्षा से बड़ा प्रेम है। मैं ऋषियों आश्रम आसपास ही मंडराया करता था। मैं विधार्थियो की चोटी खींचकर भागता था , हवन सामग्री झपट लेता था। एक बार ऋषि का कमंडल ही ले भागा था। इसी से तुम मेरे विद्या प्रेम का अनुमान कर सकती हो। मैं तो कुलपति ही बनूँगा “

कुलपति बनने के लिए बेसिक नीड्स तो यही है जो परसाई जी ने बताई। चाहे कुछ हो ये वाले कुलपति स्पष्टवादी है ये तो मानना पड़ेगा। एक अंग्रेज ने कहा था कि राष्ट्रवाद गुंडों की आखिरी पनाहगाह है। हमारे वीसी साहब भी कह रहे है कि लड़कियों से छेड़छाड़ पर रोक लगाने से कॉलेज में राष्ट्रवाद को खतरा है।

फिर बात अकेले कुलपति की भी नहीं है। हम क्यों भूल जाते है भारत विश्व गुरु है। यहाँ पर प्रजनन पूर्व लिंग जांच पर सरकार ने पाबन्दी लगाई हुई है। यहाँ सरकार बाकायदा ” बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ ” का स्लोगन चलाती है। इस बात पर अब तक कन्फ्यूजन है बेटी बचानी किस से है ?यहाँ पर त्योहारों पर लड़कियों को खाना भी खिलाया जाता है। अब बताओ वीसी क्या करे ? ये सिर्फ बनारस का ही हाल थोड़ी है। एक आध अपवाद को छोड़ दे तो हर कॉलेज , यूनिवर्सिटी में गर्ल्स हॉस्टल के गेट छह बजे बंद हो जाते है। कमाल बात है हर यूनिवर्सिटी में 24 घंटे लाइब्रेरी खुली रहती है पर लड़कियों के हॉस्टल 6 बजे बंद हो जाते है। लाइब्रेरी किसके के लिए खुली रहती है ? हर यूनिवर्सिटी में लड़को के हॉस्टल चारो तरफ से खुले होते है और लड़कियों के जेल की तरह बंद। 2017 में लड़कियों को पढाई एक मजबूरी की तरह दी जा रही है। इतनी सुंदर सुंदर यूनिवर्सिटी में लड़कियों को शाम को कैद कर दिया जाता है। छोटे शहरो में और बुरा हाल है। बनारस का ये आंदोलन सिर्फ बनारस तक का ही नहीं है। लड़कियों की मांग का किसी पोलटिकल पार्टी से भी कोई लेना देना नहीं है। बनारस में पुलिस की लाठियों के सामने निडर खड़ी लड़कियाँ वो मिसाल है जो इस मर्दवादी समाज की नीव उखाड़ सकती है। लड़कियों ने बहुत सीधे सामान्य शब्दों में पूछा है कि लड़को को छूट क्यों मिली हुई है। उनको भी 6 बजे बाद जेल में बंद करो।

इस आंदोलन का आगे जो भी हो पर इस आंदोलन ने जो कुछ अब तक दिया है एक मील का पत्थर है। लड़कियों की लड़ाई अब दो कदम आगे बढ़कर ही लड़ी जानी है।बनारस की उन सभी लड़कियों के ज़ज्बे को दिल से सलाम। ये आंदोलन देश भर में होना चाहिए। शिक्षा हमारा बुनियादी अधिकार है। ये कोई अहसान नहीं है। यौन अपराध को छेड़छाड़ कहना भी अब बंद होना चाहिए।

#इस लेख को ‘अमोल सरोज स्टेटस वाला’ किताब के लेखक अमोल सरोज ने लिखा है. हिसार के रहने वाले अमोल पेशे से CA हैं और सामाजिक मुद्दों पर अपना पक्ष रखते रहते हैं. लेखक अपने विचारों के लिए आज़ाद है.

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