जन्मदिन विशेष: दलितों के हक़ के लिए उठने वाली आवाज़ जो फूलन देवी ने बुलंद की

इतिहास| 10 अगस्त, 1963 को फूलनदेवी का जन्म हुआ था| वो क़द्दावर नेत्री थीं| अपने ऊपर हुए अत्याचारों की वजह से वो एक दौर में डकैत बन गयी थीं लेकिन बाद में उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया|

फूलन की शादी ग्यारह साल की उम्र में हुई थी लेकिन उनके पति और पति के परिवार ने उन्हें छोड़ दिया था। बहुत तरह की प्रताड़ना और कष्ट झेलने के बाद फूलन देवी का झुकाव डकैतों की तरफ हुआ था। धीरे धीरे फूलनदेवी ने अपने खुद का एक गिरोह खड़ा कर लिया और उसकी नेता बनीं। दलित जाति से होने के नाते उन्होंने दलितों के साथ हो रहे अत्याचारों को देखा और जिया था| सिर्फ़ उनकी जाति की वजह से उनका कई बार बलात्कार हुआ जिसका बदला लेने के लिए फूलन ने बन्दूक का सहारा लिया| फूलन यूं तो एक दौर में डकैत के तौर पर जानी जाती थीं लेकिन ग़रीबों और दबे हुए लोगों के लिए उन्होंने जो किया उसके लिए उनका सम्मान हमेशा होता रहा|

इंदिरा गाँधी की सरकार ने (1983) में उनसे समझौता किया की उसे (मृत्यु दंड) नहीं दिया जायेगा और उनके परिवार के सदस्यों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया जायेगा और फूलनदेवी ने इस शर्त के तहत अपने दस हजार समर्थकों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

बिना मुकदमा चलाये ग्यारह साल तक जेल में रहने के बाद फूलन को 1994 में उत्तर प्रदेश की मुलायम सिंह यादव की सरकार ने रिहा कर दिया। बाद में मुलायम ने उन्हें समाजवादी पार्टी का टिकेट दिया| 1996 में वो भदोही से लोकसभा सीट जीतीं|

25 जुलाई 2001 को उनकी शेर सिंह राणा नामक अपराधी ने हत्या कर दी| राणा तिहाड़ जेल में बंद था लेकिन फ़र्ज़ी तरह से भाग निकला था|

Leave a Reply

Your email address will not be published.