खान पाने की जद्दोज़हद ने हमें सिखाया विज्ञान

August 14, 2019 by No Comments

आदिम से मानव बनने में प्राप्त और सहायक वैज्ञानिक चेतना का उद्गम, कोई दैवीय कृत या चमत्कार न हो कर, हमारे खाने को प्राप्त करने के संघर्ष से सम्बद्ध है। अवलोकन, विश्लेषण और प्राप्त ज्ञान का नए रूप से परिपालन यही मानव की खास विशेष योग्यता है जो उसे प्राणी जगत में अन्य से पृथक करती है ।

सममानव, समकालीन परिवेश के स्तनीयजन्तु में सबसे शारीरिक अशक्त प्राणी था और जीने के कठोर संघर्ष में जीने के लिए उसे पर्याप्त आहार की आवश्यकता थी, जो पूरी नहीं हो पा रही थी। अपने भोजन की आवश्कता को पूरा करने के लिए उसने अनगढ़ उपकरण बनाए (जो कालांतर में विकसित हुए) जिससे की खाना प्राप्ति में उसे आसानी हुई और उसे फुर्सत को अधिक समय मिला। जिससे की अब उसके पास अवलोकन को अधिक समय था । समूह में रहने का भी उसे लाभ मिला कि वह अपने अवलोकन को अन्य से साझा कर सकता था, कारण जिसके उसकी समझ में सुधार आया ।

रसगुल्ला की चिंता


वर्तमान में भी हमारी सहूलियत और विज्ञान से सम्बन्धित सकारात्मक-नकारात्मक कई वस्तुओं की उत्पत्ति हमारे खाने से जुड़ी है, जैसे की खाना पकाने के लिए बर्तन बनाना, खाना ना जले उस तापमान को जानना, खाना बर्तन ना चिपके उसके लिए तेल, कृषि के लिए योग्य जमीन तैयार करना, उर्वरक बनाने के लिए खाद बनना, कृषि के लिए उपकरण, अनाज को सहेजने के लिए भंडारगृह बनाना, उत्पादन से व्यापार आदि। इस कारण विभिन्न संस्कृतियों में अन्न को पवित्र माना जाता है हालांकि आज हमारे सामने विषम परिस्थिति है की देश में जितना अनाज सड़ जाता है, बर्बाद हो जाता है उससे हम अपनी पूरी आबादी के खाने की आश्यकता की पूर्ति कर सकते है।

(वैभव मिश्रा)

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