विशेष: कैसे बने किशोर युवाओं के दिलों की धड़कन….

October 13, 2017 by No Comments

किशोर कुमार की आज 30वीं पुण्यतिथि है.इस मौक़े पर हम उनके बारे में कुछ बातें साझा कर रहे हैं..

किशोर का जन्म 4 अगस्त 1929 को खंडवा में हुआ था. यूँ तो उन्होंने बतौर संगीतकार, एक्टर, निर्देशक, गीतकार और स्क्रीन राइटर भी काम किया है लेकिन उनको सबसे ज़्यादा ख्याति उनकी गायकी ने ही उन्हें दी. किशोर कुमार ने अपने गायकी करियर की शुरुआत सन 1948 में आयी ज़िद्दी फ़िल्म से की. मशहूर संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने उन्हें “मरने की दुआएँ क्यूँ मांगू, जीने की तमन्ना कौन करे” में पहला मौक़ा दिया था. कामिनी कौशल की अदाकारी वाली इस फ़िल्म से देव आनंद ने भी अपने सफ़र की शुरुआत की थी.

शुरूआती दौर में उन्हें बहुत कामयाबी नहीं मिली लेकिन वो अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे. इस दौर में उन्होंने गायकी के अलावा एक्टिंग में भी लगातार हाथ आज़माया. उनकी एक्टिंग की ख़ूब तारीफ़ हुई लेकिन वो गायकी में ही नाम कमाना चाहते थे. किशोर जिस दौर में अपने करियर की शुरुआत करते हैं और संघर्ष का दौर देखते हैं, ये दौर मुहम्मद रफ़ी का दौर है. इस दौर में रफ़ी के अलावा मुकेश, तलत महमूद जैसे गायकों ने पकड़ बनायी हुई थी. क़द्दावर गायकों के बीच में अपनी एक जगह बना लेना अपने आप में एक बड़ी बात थी. इस दौर में टैक्सी ड्राईवर,चलती का नाम गाड़ी, पेइंग गेस्ट,पड़ोसन, तीन देवियाँ और गाइड जैसी फ़िल्मों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा. उनको बड़ी कामयाबी या ये कहा जाए कि सुपर स्टारडम 1969 में हासिल हुआ जब उनके आराधना फ़िल्म में गाये गाने युवाओं के दिलों की धड़कन बन गए. आराधना की कामयाबी के बाद वो बहुत जल्द ही नंबर एक गायक बन गए. उन्हें अपना पहला फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी इसी के गाने “रूप तेरा मस्ताना” के लिए मिला.

इस दौर में उनके गाये गाने ख़ासकर जो उन्होंने दो रास्ते, अमर प्रेम, कटी पतंग, शर्मीली, मंज़िल और अभिमान फ़िल्मों के लिए गाये थे ख़ासे मशहूर हुए. आपातकाल के दौर में उन्हें संजय गाँधी ने कांग्रेस पार्टी के प्रोग्राम में गाना गाने को न्योता दिया था लेकिन किशोर ने इस न्योते को ठुकरा दिया जिसके बाद इनफार्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग मंत्री विद्या चरण शुक्ला ने 1975-77 के बीच में आल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर उनके गाने बजाने पर अनऑफिशियल पाबंदी लगा दी.

किशोर कुमार को 8 बार फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड से नवाज़ा गया है. 1985 में रिलीज़ हुई फ़िल्म साग़र के समय ही उन्होंने रिटायरमेंट का मन बना लिया था. वो अपने अंतिम दिनों में अपने गाँव लौटना चाहते थे. उनका 13 अक्टूबर,1987 को देहांत हो गया था.

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