किसी के दिल में मोहब्बत पैदा करने का अमल…मौला अली ने फ़रमाया

March 1, 2019 by No Comments

मौला अली रज़ी अल्लाहु ताला अनहु से एक शख्स ने अर्ज़ किया या अमीरुल मूमीनीन मैं चाहता हूँ कि लोगों के दिलों पर हुकूमत करूँ,लोग मेरी बातों को सुनें और मेरी बात मानें।इस के लिए मुझे क्या करना चाहिए।इसके जवाब में मौला अली रज़ी अल्लाहु ताला अनहु ने फरमाया कि ए शख्स अगर तू लोगों के दिलों पर राज़ करना चाहता है तो लोगों से अच्छे पेश आओ,लोगों के साथ भलाई करो।लोगों की खिदमत करते रहो।इस से लोग तुम्हारी इज्ज़त करेंगे।और तुम उनके दिलों पर राज़ करोगे।
दोस्तों इस्लाम में ख़िदमत-ए-ख़लक़ ये है कि जिन अफ़राद पर ज़ुलम हो उनकी मदद की जाये।हज़रत बरा इबन आज़िब फ़रमाते हैं कि अल्लाह के रसूल सललल्लहु अलैहि वसल्लम ने हमें सात बातों का हुक्म दिया उन में एक बात ये थी कि मज़लूम की मदद की जाये। (बुख़ारी:6222)

मज़लूम की मदद की बहुत सी सूरत हो सकती हैं,मआशी भी,क़ानूनी भी और अख़लाक़ी भी ताकि उसे ये एहसास हो कि वो सोसाइटी में तन्हा नहीं है बल्कि उस के साथ एक ऐसी जमात है जिसके सीने में धड़कता दिल है।ये इस्लाम सिर्फ़ अपनों को ही नहीं नवाज़ता बल्कि अपने ना मानने वालों के साथ भी हुस्न-ए-सुलूक की तलक़ीन करता है जिस तरह यमामा के गवर्नर शमामा बिन उसाल के साथ आपने हुस्न-ए-सुलूक का मुज़ाहरा किया,अब्बू सुफ़ियान को सिर्फ माफ़ ही नहीं किया बल्कि ऐलान कर दिया कि जो अबू सुफ़ियान के घर में दाख़िल हो जाएगी उस के लिए भी माफ़ी का ऐलान है (मुस्लिम: 4622)
अल्लाह के रसूल सललल्लहु अलैहि वसल्लम जब गारे हिरा से वापिस लौटे और अपनी बीवी हज़रत ख़दीजा से ग़ार में पेश आने वाले वाक़िया की इत्तिला दी और फ़रमाया”मुझे तो अपनी जान का ख़ौफ़ हो गया है”इस मौक़ा पर उन्होंने आपकी ढारस बंधाई,अल्लाह आपको रुस्वा नहीं करेगा,बे यारो मददगार नहीं छोड़ेगा,आप तो ख़िदमत-ए-ख़लक़ करते हैं और जो भी ऐसे औसाफ़-ए-हमीदा का मालिक होता है वो अल्लाह के लुतफ़ का मुस्तहिक़ होता है।
हज़रत अबूबकर की इन्सानी ख़िदमात तारीख़ इन्सानी के रोशन अबवाब हैं।कमज़ोरों को ख़रीद कर आज़ाद करना,बेवा औरतों की बकरीयां दूहना,बूढ़े, अपाहिज का सालाना वज़ीफ़ा मुतय्यन करना और सुबह के अंधेरे में अंधी,बूढ़ी औरत की ग़लाज़त साफ़ करना आप का हुस्न अमल था।हज़रत उम्र रज़ी अल्लाहु ताला अनहु जो मसाकीन और ज़रूरतमंदों के तआवुन के लिए “बैत-उल-माल” क़ायम कर रहे हैं और जिन्हों ने बिना इख़तिलाफ़-ओ-लिहाज़ मज़हब,अपाहिज,अंधे,लंगड़े,माज़ूरों और दूध पीते बच्चों के वजीफे दिये।अक्सर शहरों में मेहमान ख़ाने तामीर करवाए,कुँवें खुदवाए,मदीना में लंगर ख़ाना बनवायाअ रातों में गशत लगा कर रियाया के अहवाल दरयाफ़त किए।

दूसरों के काम आना,उनको फ़ायदा पहुंचाना,उनकी ख़िदमत करना ये नबियों की सिफ़त है।हज़रत-ए-यूसुफ़ अलैहिस-सलाम ने अपने भाईयों के लिए किया कुछ नहीं किया।उनके खाने पीने का साज़-ओ-सामान फ़राहम किया।हज़रत-ए-मूसा जब मुदीन के कुँवें पर पहुंचे तवाँ दो बच्चीयों की मदद की जो कुँवें के पस खड़ी थी।
आज ज़रूरत है कि हम इन्सानियत की फ़िक्र करें,हमारी पहचान इन्सानियत के बही ख़ाह-ओ-ख़ैर नवाह की हैसियत से हो,हमारे अंदर ख़िदमात इन्सानियत की ऐसी तुरुप मौजूद हो कि समाज का वो फ़र्द हमें अपना मूनिस-ओ-ग़मख़वार समझे,अगर हम ने इन्सानियत की फ़िक्र छोड़ दी तो हम ख़ैर उम्मत कहलाने के मुस्तहिक़ हरगिज़ नहीं हो सकते।
एक अरबी शायर कहता है:तर्जुमा “लोगों के साथ एहसान करो तुम उनके दिलों को अपना ग़ुलाम बनालोगे” एहसान के ज़रीये ही इन्सान को ग़ुलाम बनाया जा सकता है।इस लिए दोस्तों ज़रूरत है कि हम अपने आस पास देखते रहें, और किसी को परेशानी में देखें तो उनकी मदद ज़रूर करें।हम जिस भी लिहाज से किसी की मदद कर सकते हैं करें।इस से हमारी इज्ज़त बढ़ेगी और लोगों की दुआ भी मिलेगी। साथ में समाज में नाम भी होगा।लोगों की मदद करने से माल में बरकत भी होगी।

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