मक्का में जन्मे मौलाना आज़ाद थे भारत-पाकिस्तान बँटवारे के कट्टर विरोधी..

November 11, 2018 by No Comments

दिल्ली: मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का जन्म 11 नवंबर 1888 को सऊदी अरब के मक्का शहर में एक भारतीय परिवार में हुआ.भारत में 1857 की असफ़ल क्रांति के बाद उनका परिवार मक्का चला गया था.उनके पिता मौलाना खैरुद्दीन साल 1898 में परिवार सहित भारत लौट आए और कलकत्ता में बस गए. आज़ाद को बचपन से ही किताबों से लगाव था. जब वे 12 साल के थे तो बाल पत्रिकाओं में लेख लिखने लगे.हिंदू-मुस्लिम एकता के पैरोकार मौलाना आज़ाद कभी भी मुस्लिम लीग की द्विराष्ट्रवादी सिद्धांत के समर्थक नहीं बने, उन्होंने खुलकर इसका विरोध किया.

यह सर्व विदित है कि मौलाना आज़ाद, मोहम्मद अली जिन्ना और बंटवारे के प्रबल विरोधी थे और धर्म निरपेक्ष भारत में मुसलमानों के सह-अस्तित्व की सामूहिक भावना के प्रतीक थे। अखबारों के लिए जारी एक बयान में 15 अप्रैल, 1946 को कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आजाद ने कहा था ‘‘मैंने हर तरह से पाकिस्तान की उस स्कीम को समझ लिया है जिसे मुस्लिम लीग ने तैयार किया है। एक भारतीय होने के नाते मैंने इसके भारत के भविष्‍य पर पड़ने वाले प्रभाव का भी अंदाजा लगाया है। एक मुसलमान होने के नाते मैंने इस पहलू पर भी गौर किया है कि इसका भारत के मुसलमानों पर क्‍या असर होगा। इस योजना के सभी पक्षों पर विचार करने के बाद मैंने निष्‍कर्ष निकाला है कि यह सिर्फ भारत के लिए ही नुकसानदेह नहीं है, बल्‍कि पूरे मुस्‍लिम समुदाय के लिए नुकसानदेह है। यह योजना जिन समस्‍याओं के समाधान के लिए बनाई गई है वह और समस्‍याएं पैदा करेगी।’’

कांग्रेस अध्‍यक्ष होने के नाते मौलाना आजाद ने जिन्‍ना को यह समझाने की कोशिश की कि वह अपना कठोर रवैया बदलें। उन्‍होंने एक गोपनीय तार भी भेजा। इस तार में उन्‍होंने कहा ‘‘मैंने आपका 9 जुलाई का बयान पढ़ा है। दिल्‍ली प्रस्‍ताव एक अच्‍छा प्रस्‍ताव है और राष्‍ट्रीय सरकार सिर्फ एक ही पार्टी की सरकार नहीं होगी। लेकिन लीग इसे मानने को तैयार नहीं थी क्‍योंकि यह योजना दो राष्‍ट्र के सिद्धांत पर आधारित नहीं थी।’’ जिन्‍ना का जवाब सिर्फ नकारात्‍मक नहीं था बल्‍कि यह निश्‍चय ही अपमानित करने वाला था। उन्‍होंने कहा ‘‘मैं आपका विश्‍वास नहीं लेना चाहता। मुस्‍लिम भारत का आपका विश्‍वास पूरी तरह खत्‍म हो चुका है। क्‍या आप ऐसा नहीं सोचते कि कांग्रेस ने आपको ऐसा दिखावटी अध्‍यक्ष बना दिया है जिसे सामने लाकर वह गैर-कांग्रेसी दलों और दुनिया के अन्‍य देशों को डराती है। आप न तो मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं और न ही हिन्‍दुओं के। कांग्रेस हिन्‍दुओं की संस्‍था है और अगर आपमें ज़रा भी आत्‍मसम्‍मान बाकी है तो आप इससे तुरंत इस्‍तीफा दे दें।’’

यह मौलाना आज़ाद की उदार भावना और एकता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी कि इसके बावजूद जिन्‍ना को मनाने की महात्‍मा गांधी की कोशिशों का उन्‍होंने विरोध नहीं किया। गांधी, जिन्‍ना का दिल नहीं बदल पाए। गांधी को भी उनका जवाब कोई अलग नहीं था। गांधी ने हजार कहा हो लेकिन उन्‍होंने ज़ोर देकर दो राष्‍ट्रों के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उन्‍होंने कहा कि ‘‘हम इस बात को पक्‍का कह सकते हैं कि मुसलमानों और हिन्‍दुओं में सभी मानकों के अनुसार दो राष्‍ट्रों की भावना है। सभी अंतर्राष्‍ट्रीय मानकों और सिद्धांतों के आधार पर हम मुसलमान एक राष्‍ट्र हैं।’’ मौलाना आज़ाद ने बंटवारे को रोकने की हरसंभव कोशिश की. साल 1946 में जब बंटवारे की तस्वीर काफ़ी हद तक साफ़ होने लगी और दोनों पक्ष भी बंटवारे पर सहमत हो गए, तब मौलाना आज़ाद ने सभी को आगाह करते हुए कहा था कि आने वाले वक्त में भारत इस बंटवारे के दुष्परिणाम झेलेगा.मौलाना ने जो दृश्य 1946 में देख लिया था, वह पाकिस्तान बनने के कुछ सालों बाद ही 1971 में सच साबित हो गया.

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