#MeToo ने ग़लत विचारों वाले पुरुष को डराने का काम किया है..

October 16, 2018 by No Comments

ऐसे आंदोलन कम ही होते हैं जो सारी दुनिया मे एक साथ अपना प्रभाव दिखायें। लेकिन जब होते हैं तो इनको नज़र अंदाज़ करना मुश्किल होता है । ऐसा ही एक आंदोलन जिसका नाम आज हर ज़बान पर है वह है “मी टू कैम्पेन” ।

इस कैम्पेन का आग़ाज़ सही मायनों मे 2006 मे हो गया था। मी टू शब्द को प्रयोग सबसे पहले ताराना बर्क़ नामक एक अमेरिकी समाज सेविका ने किया है । उन्होंने महिलाओं के यौन उत्पीड़न के ख़िलाफ़ महिलाओं को जागरूक करने की कोशिश की थी। वह यौन उत्पीड़न के बारे मे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर लिखने वाली पहली महिला मानी जाती हैं। लेकिन जब 2017 मे एलिसा मिलानो ने मी टू को हैश टेग बनाकर टवीटर पर महिलाओं को आप बीती बताने के लिए उत्साहित किया तो इस को ज़बरदस्त सफलता मिली।हालीवुड से जुड़ी कई हस्तियों ने अपनी आप बीती शैयर की।

भारत मे इसको शुरू करने का सहरा तनुश्री दत्ता के सर जाता है। उन्होंने नाना पाटेकर पर यौन शोषण का आरोप लगा कर पूरे देश मे एक नयी चेतना भर दी। देखते ही देखते कई बड़े नामों के चेहरे से परदे हटने लगे। आलोक नाथ, साजिद खान, सुभाष घई जैसे बड़े नाम फ़िल्मी दुनिया से सामने आये ।राजनीति से एम जे अकबर पर इलज़ाम लगे। मीडिया जिसने इस कैम्पेन को घर घर पहुँचाने का काम किया और महिलाओं की आवाज़ बनने की कोशिश की ,वह भी इससे अछूता नहीं रहा। यहाँ विनोद दुआ पर आरोप लगे हैं। जानकारो का मानना है कि आने वाले दिनों मे और भी नामों के खुलासे होंगे।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस आंदोलन का नतीजा क्या निकलेगा। जिन व्यक्तियों पर आरोप लगे हैं उन्होंने ख़ुद को बेकसूर बताते हुए कानूनी कार्यवाही की धमकियां दी हैं। कुछ मामलें तो इतने पुराने हैं कि उनको साबित करना भी आसान न होगा। और अगर साबित होता भी है तो भारत मे न्याय प्रणाली ऐसी है कि सज़ा कब तक मिलेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। दूसरा बड़ा सवाल यह है कि क्या सभी आरोप सच्चे हैं। दूनिया मे हर तरह के लोग होते हैं ,कुछ सस्ती शोहरत के लिए, तो कुछ अपनी दुश्मनी निकालने के लिए इस आंदोलन का दुरुपयोग कर सकते हैं।

तो क्या इस कैम्पेन को असफल मान लिया जाए। शायद नहीं। दरअसल इस कैम्पेन की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इससे महिलाएं जागरूक हुई हैं। वह खुलकर सामने आ रही हैं,जिससे ग़लत विचारों वाले पुरुषों के लिये एक डर का माहौल बना हुआ है। निश्चित रुप से इससे यौन उत्पीड़न की घटनाओं मे कुछ कमी आएगी।

(नूर उज़ ज़माँ)

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