असली मुस्लिम लीडर की क्या है पहचान? मौलाना तारिक जमील साहब का बयान सुने

December 13, 2018 by No Comments

बनो उमैय्यह का सबसे हसीन बादशाह सुलेमान बिन अब्दुल मलिक,सबसे हसीन 42 साल की उम्र. उसकी मय्यत को कब्र के करीब किया गया तो उसका जनाज़ा हिलने लगा इस पर उसके बेटो ने कहा हमारे अब्बा ज़िंदा हैं. उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ फरमाने लगे कि अरे भतीजों वो ज़िंदा नहीं है कब्र का अज़ाब जल्दी शुरू हो गया है.छुपाओ इसको जल्दी, उमर बिन अज़ीज़ जिस तख़्त पर बैठा उस पर उस्मान था उस पर वलीद था उस पर अब्दुल मलिक था इस तीनो ने अपने मन को राजी किया.
उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ ने अपने रब को राजी किया।जब उमर बिन अज़ीज़ के मरने का वक़्त आया तो उसने बुलाया रज़ा बिन हैवा को और फरमाया कि मैन अब्दुल मलिक बिन मरवान जो कि इनके चाचा और ससुर दोनों थे।मैंने उसको कब्र में उतारा कफन को खोल कर चेहरा देखा तो उसका चेहरा क़िबले की तरफ से हट चुका था और रंग काला सियाह पड़ चुका था अब्दुल मालिक गोरा चिट्टा था फिर मैंने वलीद को कब्र में उतारा उसका बेटा जिसने 21 साल हुक़ूमत की.

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जब उसके कफ़न को खोल कर देखा तो उसका चेहरा काला पड़ चुका था फिर सुलेमान को कब्र में उतारा तो उसका चेहरा भी क़िबले से हट चुका था।अब मैं जा रहा हूं मुझे देखना।पहले तीनो न हुकूमत की, पूजा की।मैन अपने रब की पूजा की।जब वह खलीफा बने तो एक बड़ा अजीब ख़ुत्बा दिया।बचपन मे शेरो शायरी का शौक था तो मैं शायर बना,थोड़ा सा बड़ा हुआ तो इल्म का शौक हुआ और मैन इल्म हासिल किया जवान हुआ तो फात्मा बिन्ते अब्दुल मलिक से इश्क़ हुआ तो मैंने उससे शादी की,अब अल्लाह ने मुझे हुक़ूमत देदी है अब देखो मैं इससे कैसे उसे राज़ी करूँगा.
ये ऐसा शख्स की 3 बर्रे आज़म में कोई सवाल करने वाला,कोई खैरात लेने वाला बचा नहीं होगा।3 बर्रे आज़म में कोई मज़लूम न बचा,लेकिन वो खुद कैसा था ? घर आय बोले फातिमा बड़े अच्छे दिन गुज़रे हैं अब इम्तिहान है मैं तेरा हक़ नहीं अदा कर सकूंगा अगर तलाक लेने है तो मैं हाज़िर हूँ और अगर साथ देना है तो अपने हक़ माफ करो और फातिमा जैसी औरत हुई ही नहीं इंसानी तारीख में सियासी लिहाज़ से,दादा मरवान बादशाह, बाप अब्दुल मलिक बादशाह ,सारे भाई बादशाह,शौहर बादशाह,ये औरत हर निस्बत से शहज़ादी ,इतनी बड़ी औरत नही आई.

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फातिमा कहने लगी कि उमर मैन सुख के दिन तेरे साथ देखे हैं तो दुःख में भी तेरा साथ नहीं छोड़ूंगी, जाओ मैंने अपने सारे हक़ माफ किये।फिर हज़रत उमर के दिन और रात कैसे गुज़रे ,फातिमा बताती है कि 2 साल 2 महीने तक वो मेरे साथ बिस्तर पर लेटे तक नहीं,ग़ुस्ल की ज़रूरत ही नहीं आई सिर्फ मुसल्ले पर रोते रोते वही सो जाते.
अपनी हुक़ूमत को अल्लाह की रज़ा के लिए इस्तेमाल किया,फातिमा का सारा ज़ेवर बैतूल माल में डाल दिया ,तनखा पर आगए, ईद का मौका आया बच्चों ने मां से कहा (12 बच्चे थे) की हमे नए कपड़े चाहिए सब लोग ने कपड़े पहनते हैं,माँ ने कहा अब्बा को आने दो,अब्बा आय,ख़ज़ाने लबालब भरे हुए थे ।फातिमा ने कहा कि बच्चे कपड़े की ज़िद कर रहे हैं मैने कहा फ़ातिमा मेरे पास तो पैसे ही नही है मैं कहा से कपड़े ला कर दु,फ़ातिमा ने पूछा कि बच्चों से फिर क्या कहूँ बोले मुझे भी नहीं पता.

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इससे पहले 3 शख्स तख़्त पर बैठे तीनो ने लूट मार किये,ज़ुल्म किया औऱ ये आज उसी ख़ज़ाने पर बैठ कर अल्लाह को राजी करने की सोच रहे हैं।तब फातिमा ने कहा कि आप अगले महीने की तनख्वाह पहले ही ले लीजिए इससे बच्चों के कपड़े तो बन जायँगे।औऱ घर का खर्च मैं मज़दूरी कर के चला लुंगी।

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