कुछ सहने की बजाय उसके ख़िलाफ़ बोलें…

February 2, 2018 by No Comments

पिछले कई सालों से एक के बाद एक राज़ खुल रहे हैं कि फ़लाने बाबा के आश्रम में लड़कियों के साथ बुरा हो रहा है तो कभी किसी और बाबा के आश्रम में, देखा जाए तो अधिकांश आश्रम और धर्म के ठिकानों का यही सच बाहर आ रहा है। ये बाबा अगर किसी बात में निपुण हैं तो वो है लोगों को बहकाना।

ये बात फिर भी उतनी चौंकाने वाली नहीं थी लेकिन मुझे जिस बात का आश्चर्य लगता है वो बात ये है कि माँ-बाप अपनी बेटियों के लाख चेताने के बाद भी उन्हें इन बाबाओं के चंगुल से छुड़ाने की बजाय उन्हें और फँसा देते हैं। ये तरीक़ा मुझे बिलकुल समझ नहीं आया, आपकी बेटी कह रही है कि वो इंसान मुझे बिलकुल पसंद नहीं, वो ठीक नहीं है। बल्कि कुछ ने तो साफ़-साफ़ सारी बातें तक बता दीं, फिर भी माँ-बाप बाबाओं की बातों को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं।

जब माँ-बाप अपने बच्चे पर विश्वास नहीं करेंगे तो और कौन करेगा, किससे उम्मीद बांधी जा सकेगी, ऐसे में अधिकांश लड़कियाँ बाबाओं के आश्रम में रह जाने पर मजबूर हो जाती हैं। इससे दुखद और कुछ हो भी नहीं सकता कि आप अन्धभक्ति में इस क़दर डूबे हैं कि आपको अपने बच्चे कि पीड़ा नज़र नहीं आ रही। सही लगे या ग़लत पर छेड़छाड़, यौ-न उत्पीड़न जैसे अधिकांश मामले घर में होते हैं, बेहद क़रीबियों के हाथों होते हैं, माँ-बाप और पूरा परिवार आसपास ही होता है तब होते हैं, और उस वक़्त पीड़ित ये नहीं समझ पाता कि जब ये सभी अपने सामने हैं और ये सब करने वाला इंसान भी अपना ही है तो ये बातें किससे कही जाए और कैसे कही जाए।

फिर भी अगर कोई बहुत हिम्मत करके ये बात किसी तरह बाहर लाए भी, तो पहली सलाह चुप रहने की ही मिलती देखी जाती है। फिर कुछ नहीं, ज़िंदगी भर की घुटन है और कुछ के साथ बार-बार वही घटनाएँ, क्यूँकि जब ग़लत सहने वाला कुछ नहीं कहता, तब ग़लत करने वाला अपने आप को ज़्यादा ताक़तवर समझने लगता है और उसी तरह व्यवहार भी करता है, लेकिन अगर ग़ौर से देखो तो वो बहुत बुज़दिल होता है क्यूँकि कहीं न कहीं उसके मन में ये बात होती है कि वो ग़लत कर रहा है।

इसलिए कुछ सहने की बजाय अगर तुरंत जवाब दिया जाए तो ग़लत करने वाले की हिम्मत वहीं जवाब दे जाएगी।  ज़रूरी नहीं कि पहली ही बार में हर कोई जवाब दे पाए। हाँ, कई तरह के डर होते हैं, जो आपको ग़लत सहने पर मजबूर करते हैं, कोई क्या कहेगा? लोग कैसे रीऐक्ट करेंगे? हमारे बारे में क्या सोचेंगे? हम पर ही इल्ज़ाम लगेगा? जैसे, जाने कितने सवाल होते हैं लेकिन जवाब सिर्फ़ एक है, आवाज़ उठाना और ज़रूरी लगे तो हाथ उठाना भी। बस एक बार और फिर इन सारे सवालों का शोर मन के आसपास भी नहीं फटकेगा।

आपके साथ ग़लत हो रहा है तो किसी और से उम्मीद रखने की बजाय पहला क़दम ख़ुद ही उठाएँ, अक्सर कोई और आपकी वेदना नहीं समझ पाता, बेहद क़रीबी रिश्ते भी नहीं। पहल ख़ुद को ही करनी पड़ेगी, एक क़दम बढ़ाने की बात है, फिर रास्ता सामने ही है।

(ये आर्टिकल नेहा शर्मा द्वारा लिखा गया है)
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प्रियंका शर्मा

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