‘हर तरफ़ सिर्फ़ आँखें थी…मुझे अंदर तक भेदती हुई आँखें’

December 22, 2017 by No Comments

16 दिसम्बर है आज…4 साल पहले की वो रात आज भी सबको याद होगी और निर्भया भी…हर न्यूज़ चैनल उस घटना को इतने विस्तार से बता रहा था कि सब आँखों देखा लग रहा था…क़रीब हफ़्ते भर तक वही सुनना…वही देखना और वही सोचना।उस वक़्त वो ख़बर सुनकर, जानकर लोगों के मन में ग़ुस्सा था और मेरे मन में सिर्फ़ एक भाव था…डर,जो हर दिन गहरा रहा था।

लोग निर्भया को इंसाफ़ दिलाने के लिए सड़कों पर उतर आए थे और मैं अपने घर के दरवाज़े से बाहर निकलने में भी डर रही थी।लोग भीड़ के भीड़ इंसाफ़ माँगने निकल पड़े थे और मैं भीड़ देखकर ही अंदर तक काँप रही थी।लोग अपनी-अपनी बातें कहने के लिए आगे आए थे और मेरी सारी बातें…सारे विचार अंदर क़ैद थे…एक गहरी चुप्पी थी,मौन था…सारी ख़बरें सुनती रहती थी…सुनती ही थी क्यूँकि उसका नाट्यरूपांतर या ग्राफ़िक,जो न्यूज़ में दिखाया जाता था…वो देखने की हिम्मत नहीं होती थी।

आज भी याद है उस घटना के शायद चार-पाँच दिन के बाद घर से निकली थी माँ के साथ यूँ ही पास के बाज़ार तक, जानी-पहचानी जगह थी वो…जाने-पहचाने लोग थे पर डर बहुत था।राह चलते किसी इंसान से नज़र मिलाने का मन नहीं हो रहा था…कौन आ रहा है?कौन जा रहा है?मुझे कुछ नहीं देखना था क्यूँकि मुझे लोग नहीं सिर्फ़ उनकी आँखें महसूस हो रही थीं…हर तरफ़ सिर्फ़ आँखें थीं…मुझे घूरती हुई आँखें…मुझे अंदर तक भेदती हुई आँखें…मेरे डर का उपहास करती आँखें…मैं बस जल्द से जल्द घर पहुँच जाना चाहती थी।कुछ समय लगा ख़ुद को वापस इकट्ठा करने में,लोगों पर एक विश्वास लाने में,फिर भी..अब भी कभी-कभी लोगों पर भरोसा डगमगाता है।

दो बार दिल्ली जाना हुआ…एक तो अनजान शहर…अनजान रास्ते…अकेली नहीं गयी थी साथ परिवार के लोग थे,कुछ पहचान वाले थे…पर वो डर भी साथ था…कई जगह घूमी पर एक भी जगह ठीक से याद नही है,जहाँ भी जाती हूँ,हर जगह याद होती है मुझे,पर दिल्ली की जगहें याद नहीं हैं।पहली बार में दिल्ली से देर रात कैब से नोयडा वापस जाते वक़्त रात बहुत हो चुकी थी…माँ और भाई दोनों साथ थे।दोनों को नींद आ गयी थी,मेरी आँखें भी नींद से बंद हो जा रही थी पर मैं ज़बरदस्ती आँखें खोलती…ख़ुद को जगाए रखने की सारी कोशिशें कर रही थी…बीच में टायर पंचर हो गया…बीच सड़क उसके लिए रुकना पड़ा…मुझे वहाँ रोड में आती-जाती गाड़ियों को देखकर थोड़ा अच्छा लगा…वापस गाड़ी में बैठने के बाद जब तक हम पहुँचे नहीं तब तक मुझे चैन नहीं आया था।

अब उतना डर नहीं लगता(बिलकुल नहीं लगता ये नहीं कह सकती),देर रात आराम से अकेली घर आ जाती हूँ…जानती हूँ एक घटना या एक बुरी बात के लिए पूरे शहर या सभी लोगों को दोषी नहीं समझा जा सकता।

अब कई दोस्त बने हैं मेरे जो दिल्ली में रहते हैं,बहुत अच्छे और सुलझे हुए लोग हैं सभी…बहुत मन है अब एक बार दिल्ली जाना है,उन सबसे मिलना है,और उनके साथ ही वो सारी जगह घूमना है जो मुझे याद नहीं और वो जगहें भी जो घूम नहीं पायी…एक बार दिल्ली जाना है अपना वो डर दूर करने के लिए और सच अपनाने के लिए।

~
नेहा शर्मा
(ये लेख 16 दिसम्बर,2016 को लिखी गयी एक फ़ेसबुक पोस्ट है जिसे हम यहाँ दुबारा प्रकाशित कर रहे हैं)

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