टीपू सुलतान की वंशज को ब्रिटेन देगा बड़ा सम्मान…

October 21, 2018 by No Comments

ब्रिटेन । हाल ही में बैंक ऑफ इंग्लैंड ने घोषणा की है जिसके अनुसार 2020 में बड़े मूल्य के नोट के नये संस्करण लाने की योजना है। इस योजना के अंतर्गत 50 पौंड के नए नोट पर नूर इनायत खान की तस्वीर हो सकती है । उल्लेखनीय है कि नूर इनायत ,शेरे मैसूर टीपू सुल्तान की वंशज है। टीपू सुल्तान 1799 में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए शही-द हुए थे।

नूर के कैरियर की बात करें तो ,1940 मे नूर ब्रिटिश फोज मे शामिल हो गयी थीं। उनको फ्रेंच बोलने मे महारत थी। उनकी इस ख़ूबी ने स्पेशल ऑपरेशन एग्जिक्यूटिव के सदस्यों को प्रभावित किया यह संगठन इंगलैंड के प्रधानमंत्री चर्चिल ने बनाया था ।अपनी क़ाबिलियत के दम पर नूर सिर्फ तीन साल मे ही इंगलैंड की सेना की एक सीक्रेट एजेंट बन गईं थी।

हालांकि नूर ख़ुद भी सूफी मत से प्रभावित थी और अहिंसा मे विश्वास करती थीं। ऐसे मे एक सीक्रेट एजेंट का जीवन जीना उनके लिए बहुत कठिन था। लेकिन इसके बावजूद भी उन्होंने अपने फ़र्ज़ को बख़ूबी निभाया। इंगलैंड के नेशनल आर्काइव्स के दस्तावेजों से पता चलता है कि नूर के आला अफसर ..उनको एक मज़बूत इरादे वाली महिला मानते थे। इसी लिए उनको एक ख़तरनाक जिम्मेदारी दी गई थी ।उन को एक रेडियो ऑपरेटर के तौर पर ट्रेन करके जासूसी के लिए फ्रांस भेज दिया गया। इस ख़तरनाक अभियान मे पकड़े जाने का ख़तरा बहुत ज़्यादा था।

जर्मन सीक्रेट पुलिस ‘गेस्टापो’ के पास ऐसी तकनीक थी जिससे वह इन इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल्स की पहचान करके इनके स्रोत को पकड़ सकती थी। हुआ भी ऐसा ही, नूर के साथी एजेंटों की जल्द ही पहचान कर गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन वह नूर को पकडऩे में कामयाब न हो सके । नूर ने जर्मन पुलिस की नाक के नीच फ्रांस में अपना ऑपरेशन जारी रखा। लेकिन अक्टूबर, 1943 में उनके किसी सहयोगी की बहन ने जर्मनों के सामने उनका पहचान उजागर कर दी । कहा जाता कि नूर बहुत सुंदर थीं इसीलिए वह लड़की उनसे जलती थी। लेकिन उनको गिरफ्तार करना भी आसान नहीं था लिया। बताया जाता है छः सात पुलिस वालों ने मिलकर उन्हें काबू किया था।

उसके बाद नूर की प्रताड़ना का का दौर शुरू हुआ ।लेकिन जर्मन एजेंटो लाख कोशिशों के बाद भी उनसे ऑपरेशन के बारे में जानकारी निकलवाने मे नाकाम ही रहे।यहाँ तक कि वह वे नूर का असली नाम तक नहीं पता कर पाए। वह यह भी पता नहीं नहीं लगा पाये कि नूर भारतीय मूल की थीं। बाद में उन्हें दक्षिणी जर्मनी के एक यातना शिविर में भेज दिया गया जहां उन्हें तीन अन्य महिला जासूसों के साथ गोली मार दी। मौ-त के वक्त वह सिर्फ 30 साल की थीं।नूर की बहादुरी को उनकी मौ-त के बाद फ्रांस में ‘वॉर क्रॉस’ देकर सम्मानित किया गया। इंग्लैंड में उन्हें क्रॉस सेंट जॉर्ज सम्मान दिया गया जो अब तक केवल तीन और महिलाओ को दिया गया है।

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