हज़ारों साल पुराना सा लगने वाला इश्क़ और मेरी तसव्वुर ए जान…

February 18, 2018 by No Comments

कुछ बातें समझने के लिए ख़ास कुछ समझना नहीं है, इसी तरह की बात है प्यार की। आप लंबे समय तक ये कहते रहें कि आपको प्यार पर भरोसा नहीं है लेकिन जब प्यार होना होता है तो हो ही जाता है। अब बाक़ी लोगों का तो पता नहीं लेकिन ज़िन्दगी के किसी मरहले पर मैंने अपने ज़हन में एक तस्वीर बनायी थी। ज़ाहिर है यहाँ बात सिर्फ़ जिस्मानी तस्वीर की नहीं हो रही, बात हो रही है तसव्वुर की, तसव्वुर ए जान की।

तसव्वुर ए जान के बारे में मैंने जो कुछ भी सोचा था और लगातार सोच रहा था, उसी हिसाब से ही मैं उसकी तलाश भी करता था। ज़िन्दगी की भाग दौड़ में कुछ लोग मिले भी, एक बार तो लगा शायद यही वो जान है जिसका तसव्वुर मैंने किया हुआ है…बहरहाल, जल्द ही मेरा भ्रम टूट गया। ये वो दौर है जब मैंने ये मानना शुरू कर दिया कि वो जो एक तसव्वुर है, वो तसव्वुर ही है और ऐसा कोई शख़्स दुनिया में नहीं होता। धीरे-धीरे मुझे प्यार की बातें बनावटी लगने लगीं, हाँ मेरे ज़हन में जो प्यार की एक बुनियाद थी वो बहुत मज़बूत थी। इतनी मज़बूत जिसे मैं चाह कर भी कमज़ोर नहीं कर सकता था। वैसे मुझे तो उस ख़याल में रहना भी अच्छा ही लगने लगा था, कभी अकेले में उसी ख़याल पर नज़्म कहना और फिर उसी को सुनाना।

ख़ैर, एक रोज़ ऐसा हुआ कि मैं जब उसके लिए कही एक नज़्म सुना रहा था तो वो मेरी नज़रों के सामने आ गयी। मैंने उसे ख़्वाब माना, ब’ज़ाहिर ख़्वाब ही था… लेकिन वो ख़्वाब भी यूँ था कि महज़ ख़्वाब नहीं था।
किसी ना किसी तरह उसकी तस्वीर मेरे सामने आ जाती, चाहे फ़ेसबुक पर या फिर यूँ ही..लगातार प्यार से बचने की कोशिश करते-करते ऐसी आदत सी हो गयी थी कि जब भी ऐसा कुछ महसूस हो तो कुछ और सोचने लगो। इस बार भी ऐसा ही कुछ किया, पर ..इस बार मेरे दिल को ये महसूस होने लगा कि ये उसी तसव्वुर ए जान की रूह है जिससे मेरी पुरानी पहचान है, जो मेरी सबसे अज़ीज़ दोस्त है।

हालांकि कुछ ही रोज़ पहले मेरी उससे बातें होने लगी थीं, मुझे तो ये भी नहीं पता था कि वो मेरे बारे में कुछ सोचती भी है या नहीं और वो तो क्यों ही मेरे बारे में सोचे, मैं तो इस क़ाबिल हूँ भी नहीं। हमारी बातें बढ़ने लगीं और बातों में अपनापन भी बढ़ने ही लगा। मुझे याद है जब पहली बार मैंने उससे बात की तो भी एक अपनापन था और धीरे-धीरे वो बढ़ता ही गया। कुछ रोज़ बीते और सुबह की आधी नींद में व्हाट्सएप्प पर हमने अपने प्यार की बात की। हमें डर भी था और नहीं भी, हमने किसी तरह अपने प्यार का इज़हार किया, हज़ारों साल पुराना सा लगने वाला प्यार ज़िन्दगी के किसी हिस्से में मेरे सामने आ गया। इज़हार तो उसी ने किया लेकिन इक़रार तो मैं पहले ही कर चुका था। फिर एक बार यूँ हुआ कि उसने मुझे अपनी तब की कविता सुनाई जब हम किसी भी तरह से नहीं मिले थे। वो कविता उसने मेरे लिए लिखी है जैसे मैंने अपनी नज़्में उसके लिए लिखी हैं।

ऐसा तो है ही कि हम बहुत कुछ ऐसा लिखते हैं जो किसी भी इंसान पर फ़िट से हो जाता है लेकिन यहाँ बात आम नहीं थी। यहाँ तसव्वुर पुख़्तगी की शक्ल ले चुका था, वो तसव्वुर जो अब सिर्फ़ तसव्वुर नहीं है।

~
अरग़वान रब्बही

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