“भाजपा नेता टीवी-डिबेट में लम्बी-लम्बी बाते करते हैं और घर जाकर सो जाते हैं”

September 28, 2018 by No Comments

आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि नमाज जरूरी है या नहीं, ये तय करने का अधिकार कोर्ट का नहीं, बल्कि धार्मिक गुरुओं का है, अच्छा होता अगर ये फैसला संवैधानिक पीठ को रेफर कर दिया जाता, इसपर पजनर्विचार करने की जरूरत है, नमाज के लिए मस्जिद जरूरी या नहीं, ये कोर्ट नहीं तय करेगी ।

अयोध्या बाबरी मस्जिद विवाद की सुनवाई में आज सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कह दिया है कि मस्जिद में नमाज इस्लाम में जरूरी नहीं नमाज़ तो कहीं भी पढ़ा जा सकता है, यानी इस आधार पर दावा आज खारिज हो गया, सुप्रीम कोर्ट ने 1994 के इस्माइल फारुकी केस का पुराना फैसला बरकरार रखा है और अब इस मामले के तेजी से निपटारे की उम्मीद तेज हो गई है ।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि अगर ये फैसला संवैधानिक पीठ को रेफर हो जाता तो अच्छा होता, इस्लाम में मस्जिद एक जरूरी हिस्सा है, कुरान और हदीस में इस बात जिक्र है मस्जिद अल्लाह का घर भी है, और हम मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हैं तो हमें उसका सवाब ज्यादा हासिल होता है । उन्होंने आगे ये भी कहा कि अफसोस इस बात का है कि जब तीन तलाक का मसला आया तो कुरान का जिक्र किया गया और जब मस्जिद का मसला आया तो कुरान को भूल जा रहे हैं कि कुरान में मस्जिद में नमाज़ पढ़ना जरुरी बताया गया है ।

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि दूसरे धर्म के धार्मिक स्थल क्या जरूरी नहीं है ? उन्होंने सवाल किया कि न्यायालय कैसे तय कर सकती है कि क्या जरूरी है क्या नहीं ? यह तय करने का अधिकार धार्मिक गुरुओं को है जो सिर्फ वही ये फैसला कर सकते हैं । ये देश विहिप और आरएसएस के मुताबिक नहीं चल सकता है, उन्होंने आरएसएस पर तंज करते हुए कहा कि आप अपनी शाखा में रहें और तय करें कि मंदिर कब और कहां बनाना चाहिए. यह देश संविधान के हिसाब से चलता है, न कि किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं के आधार पर इसलिए इसपर ज्यादा उछल कूद करने से कोई फायदा नहीं ।

असदुद्दीन ओवैसी ने AajTak के खास कार्यक्रम हल्लाबोल में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कहने के बावजूद बीजेपी के नेता यह समझ नहीं कर पा रहे हैं कि यह केस टाइटल सूट का है न कि आस्था का. उन्होंने बीजेपी नेता सुधांशु त्रिवेदी के साथ बहस में कहा कि बीजेपी की सरकार अदालत में कुछ और कहती है, टीवी बहस में कुछ और चुनावों के समय में कुछ और, दोहरा मापदंड क्यों अपनाती है बीजेपी ?

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि बीजेपी नेता अयोध्या पर बहस में जो दलील देते हैं वह उन्हें अटॉर्नी जनरल के जरिए सुप्रीम कोर्ट में देनी चाहिए लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें पता है कि कोर्ट ऐसी बातों को तवज्जो नहीं देता है उसे ख़ारिज कर देगा इसीलिए टीवी डेबिटों पर लंबी लंबी बातें करते हैं और फिर घर जाकर सो जाते हैं ।

इधर सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद में नमाज को मजहबी जरूरत को हाशिए पर धकेला और उधर अयोध्या में राम मंदिर की उम्मीदों को पंख लग गए, मंदिर समर्थकों को लगने लगा है कि अब वो दिन दूर नहीं जब देश की सबसे बड़ी अदालत से विवादित जमीन पर मालिकाना हक की जंग भी वो जीत लेंगे. कुछ लोग तो कह रहे हैं कि 2019 के पहले मंदिर का निर्माण हो जायेगा लेकिन अभी सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला तो आना बाकी है इतना जल्दी कहाँ निर्माण हो सकता है ?

बीजेपी के लिए भी ये उम्मीदें जवां करने वाला फैसला है, राम मंदिर का मसला राजनीति के कठघरे में दशकों से खडा है गेंद अदालत के पाले में है तो मोदी सरकार भी विवाद की इस भट्टी में हाथ झुलसाने से हिचक रही है, इसी लिए बहुत ही सतर्कतापूर्वक कदम उठाएगी, कोर्ट का फैसला मोदी सरकार के लिए हर तरह से फायदेमंद होगा, जीते तो बीजेपी की जीत मानी जाएगी और हारे तो कोर्ट का फैसला बताकर पल्ला झाड़ने का रास्ता तो खुला ही रहेगा ।

सुप्रीम कोर्ट ने तारीख भी तय कर दी है कि 29 अक्टूबर से जमीन पर मालिकाना हक के केस में सुनवाई होगी, संकेत बता रहे हैं कि देश की सबसे ब़ड़ी अदालत भी अयोध्या विवाद को जल्द निपटाने के मूड में है यही वजह है कि 1994 के फैसले को बरकरार रखा. देश 2019 की चुनावी दहलीज पर खड़ा है और उससे पहले अयोध्या पर आय़ा कोई भी फैसला किसी भूचाल से कम नहीं होगा । भाजपा इसमें अपनी रोटी जरूर सेंकेगी जो इसके जीत के लिए एक जड़ी बूटी का काम करेगा ।

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