जो शौहर अपनी बीबी पर हाथ उठाते है वो कुरान की….

February 25, 2019 by No Comments

क़ुरआन पाक के चौथे पारे के सूरे निसा में आया है जिसका तर्जमा यह है.औरतें फ़रमांबर्दार होती हैं,मर्द की ग़ैरमौजूदगी में अल्लाह की दी हुई हिफ़ाज़त से (उसके हुक़ूक़ की)हिफ़ाज़त करती हैं।और जिन औरतों से तुम्हें सरकशी का अंदेशा हो तो (पहले) उन्हें समझाओ और(अगर इस से काम ना चले तो) उन्हें ख़्वाब-गाहों में तन्हा छोड़ दो।(और इस से भी इस्लाह ना हो तो )उन्हें मा’र सकते हो।फिर अगर वो तुम्हारी बात मान लें तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई का कोई रास्ता तलाश ना करो।यक़ीन रखो कि अल्लाह सब के ऊपर,सबसे बड़ा है।(क़ुरआन 4:34)
ये आयत वज़ाहत करती है कि ये इजाज़त सिर्फ इन हालात में है जब औरत सरकशी की इस हद तक पहुंच जाए कि उसको रोकने का कोई और तरीक़ा ना रहे सिवाए तलाक़ के।जब कोई औरत ऐसे किसी अमल में मुबतला होती है तो औरत का रवैय्या ना सिर्फ मर्द के लिय तकलीफ़ का बाइस होता है बल्कि उसे बद-दिल करने और किसी और की तरफ़ राग़िब होने का बाइस भी बन सकता है।

ऐसी स्टेज ना सिर्फ इन दोनों के लिए नुक़्सानदेह होती है बल्कि पूरे ख़ानदान और मुआशरे पर भी असर छोड़ती है।चुनांचे यहां फ़िज़ीकल सज़ा की इजाज़त एतिदाल के लिए और इस बुराई से नजात के लिए होती है।मारने सज़ा की इजाज़त इंतिहाई हालात में है।इस इंतिहाई सूरत-ए-हाल में भी मारना आख़िरी ऑपशन रखा गया है।सबसे पहले नसीहत करे.अगर उस का मुसबत नतीजा ना निकले तो बिस्तर से अलैहदा हो जाए और और अगर ये तरीक़ा भी नाकाम हो जाए तो तब आहिस्तगी से तादीबा मारने की इजाज़त है।
अगर एक दफ़ा ऐसा करना पड़ गया तो इसके बाद बाद एहतियात करने का हुक्म दिया गया है अगर वो अपनी इस्लाह कर ले तो तुम उन पर ज़्यादती का कोई रास्ता मत तलाश करो.आयत की तफ़सीर करते हुए हमें हुज़ूर की अहादीस को भी मद्द-ए-नज़र रखना होता है।औरत को हदीस में उस वक़्त तक मारने से मना किया गया है.जब तक वह कोई ऐसा काम न करे जिस से वह बुराई के रास्ते की तरफ जाए.

वह कोई काम खुली बे-हयाई का ना करें.वो तुम्हारा बिस्तर किसी ऐसे शख़्स से पामाल ना कराये जिसे तुम पसंद नहीं करते.वो तुम्हारे घर में किसी ऐसे शख़्स को दाख़िल ना होने दें जिसे तुम नापसंद करते हो,मगर ये कि तुम्हारी इजाज़त से.अगर औरतें (इन बातों) की ख़िलाफ़वरज़ी करें तो तुम्हारे लिए इजाज़त है कि तुम उन्हें बिस्तरों पर अकेला,तन्हा छोड़ दो.(इन पर सख़्ती करो)मगर शदीद तकलीफ़ वाली चोट ना मॉरो(अगर मारना ही चाहो।)
ये ज़ाहिर करता है कि ये अमल जिस्मानी से ज़्यादा नफ़सियाती ज़्यादा है और इस का मक़सद ज़ोजीन के दरमयान इफ़्फ़त,बाहमी मुहब्बत और उंसीयत को क़ायम रखना है.अगर औरत के एक ग़लत तर्ज़-ए-अमल की जांच ना की जाये तो ये बात यक़ीनी है कि ताल्लुक़ात पर बहुत मनफ़ी असरात पड़ते हैं।शौहर की सरकशी की सूरत-ए-हाल में बीवी को ऐसे अमल की इजाज़त क्यों नहीं दी गई?
याद रखीए शौहर क़ानूनी दूसरी बीवी रखने का मजाज़ है जब कि औरत एक वक़्त में दो शौहर नहीं रख सकती जिसकी वजूहात वाज़िह हैं.यानी मर्द के पास एक ही वक़्त में ऑपशन मौजूद होते हैं।इस को मदनज़र रखते हुए और नफ़सियाती और जिस्मानी फ़र्क़ और हक़ीक़ी ज़िंदगी के हक़ायक़ को देखते हुए बीवी की शौहर को इस तरीक़े से नसीहत करने की इजाज़त नहीं दी गई.

चीनी मुस्लिम


वो शौहर को दरुस्त करने के लिए ऐसे मसले को अदालत या ख़ानदान के बड़ों के सामने लेकर जा सकती है।एक शरई रियासत उन मसाइल के हल का बाक़ायदा इंतिज़ाम करती है।शौहर को रियासत की तरफ़ से पाबंद किया जाता है.और सज़ा दी जाती ह.मज़ीद अगर औरत महसूस करती है कि वो अपने ख़ावंद के साथ किसी वजह से नहीं रह सकती तो औरत को इजाज़त है कि वो ख़ला लेकर अलैहदगी इख़तियार कर ले.
मगर जब तक वो अक़द निकाह में मौजूद है इस की ज़िम्मेदारी है कि ख़ावंद की मौजूदगी और ग़ैरमौजूदगी में इसके साथ वफ़ादार रहे.मर्द-ओ-ज़न के बाहमी ताल्लुक़ की दरूस्तगी ही एक ख़ूबसूरत मुआशरे की बुनियाद है।इस्लाम में अल्लाह को उम्मत की इजतिमाईयत निहायत ज़्यादा अज़ीज़ है और इस इजतिमाईयत को तोड़ने पर सख़्त वईदें हैं.इस इजतिमाईयत का सबसे पहला पत्थर मियां बीवी का सही ताल्लुक़ है जिसकी बुनियाद पर फिर आगे चल कर पूरी उम्मत खड़ी होती है.

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