“रफ़ी साहब अपने आप में एक स्कूल हैं”

December 24, 2017 by No Comments

मशहूर गायक मुहम्मद रफ़ी के बारे में कहा जाता है कि बॉलीवुड इतिहास में उनसे अच्छा गायक ना आया है और शायद आने वाले दौर में आ भी नहीं सकेगा. रफ़ी साहब के चाहने वालों की दीवानगी इस तरह है कि देखते ही बनती है. हमने रफ़ी साहब के जन्मदिन के मौक़े पर कई लोगों से बात की. इसी सिलसिले में जब हमने जयपुर की रहने वाली रीना बोराना से बात की तो उन्होंने रफ़ी साहब के बारे में हमें बहुत सी बातें बतायीं.

रीना ने कहा,”रफ़ी मेरे लिए सुकून का नाम है….एक ऐसी आवाज़ जो रफ़ी की होकर भी रफ़ी की ना होकर हीरो की आवाज़ बन जाती थी. वो आवाज़ जिसमे सुबह की बेला में भजन सुनकर एक आत्मिक शांति मिलती है और मस्ती के टाइम जिनके गाने सुनकर डांस करने का मन होता है.मैने मधुबन में राधिका नाचेगी जैसा क्लासिकल सॉन्ग नही सुना. वहीं ओ शंकर मेरे कब होंगे दर्शन तेरे में उनकी आवाज़ दूसरी दुनिया में ले जाती है.”

रीना ने कहा कि रफ़ी साहब हर मिज़ाज और तहज़ीब के गानों को शानदार तरह से गाते थे. उन्होंने कहा,”बरसात की रात की क़व्वाली कौन भूल सकता है। जिसमे रफ़ी साहब की आवाज़ बहुत बाद में आती है लेकिन महफ़िल लूट ले जाती है। आशा जी, मन्ना डे सब के साथ और सबसे अलहदा वो आवाज़ प्यार भर देती है जेहन में.कौन सी शादी ऐसी होगी जिसमें बाबुल की दुआएँ लेती जा , ये गाना नही बजा होगा। हर पिता को उस वक़्त रफ़ी साहब अपनी आवाज़ दे देते है. दिलीप साहब से लेकर शम्मी कपूर तक हीरोज को सुपरस्टार बनाने में रफी साहब की आवाज़ का अहम रोल है.”

बदलते दौर में संगीत के ढलान पर जब हमने रीना से सवाल किया तो उन्होंने कहा कि संगीत ढलान पर एकदम से नही आया, अच्छे सिंगर्स थे लेकिन अच्छे गीतकार ख़त्म हो गए। 80s का दौर संगीत का ढलान था जब उल्टे सीधे शब्दों और तुकबंदियों ने soulful लिरिक्स की जगह ले ली. उसको म्यूजिक में ढालने के नाम पर कंपोजर्स या तो बेकार संगीत बनाते या सीधा चुरा लेते और 90s संगीत के लिए सबसे बुरा दौर था. खै़र हम रफ़ी साब की बात कर रहे थे.एक्चुअली रफ़ी साहब के गाने ऐसे है कि उनका रीमिक्स भी मुश्किल है. नए दौर में जो संगीत प्रेमी है वो रफ़ी को सुनते है. उनके फै़न भी है लेकिन मेजोरिटी उनके गानों से अनजान है. प्राइवेट FM चैनल्स उन्हें कम बजाते है और विविध भारती को कम सुनते है. मेरी ही उम्र के लोग किशोर कुमार के गाने जो उन्होंने 80 में गाये वो जानते है लेकिन रफ़ी साहब को कम सुना है लेकिन अगर किसी को सिर्फ़ फ़िल्मी गाने सुनकर संगीत सीखना है तो उसे रफी साहब को सुनना sufficient होगा, वो एक स्कूल हैं.हक़ीक़त का “मैं ये सोच कर उसके दर से चला था” या “कर चले हम फ़िदा” सुनकर किसके रौंगटे खड़े नही होते और उनकी सबसे अच्छी बात थी उन्होंने नए सिंगर्स को बहुत सपोर्ट किया.

रीना बोराना

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