क्या है मुहम्मद बिन सलमान की सच्चाई?

October 19, 2018 by No Comments

वैश्विक राजनीति में इस समय अगर सबसे अधिक चर्चा किसी की हो रही है तो वो है सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की. क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान को एमबीएस के नाम से भी जाना जाता है, उनके समर्थक उन्हें उदारवादी नेता कहते हैं तो उनके विरोधी उन्हें निरंकुश शासक की संज्ञा देते हैं. सच्चाई क्या है और ये सवाल बार-बार क्यूँ उठते हैं, आइये समझते हैं.

मुहम्मद बिन सलमान कहने को क्राउन प्रिंस हैं लेकिन देश की सत्ता की असली चाबी असल में उन्हीं के पास है और इस समय सऊदी अरब के डी-फैक्टो बादशाह वही हैं.मुहम्मद बिन सलमान ने जैसे ही सत्ता संभाली वैसे ही कुछ ऐसी घोषणाएँ कीं कि पश्चिमी देशों में उनकी तारीफ़ के गीत गाए जाने लगे. उन्होंने महिला सुधार की बात की और लम्बे समय से महिलाओं पर गाड़ी चलाने को लेकर लगी पाबंदी को हटा लिया गया. इतना ही नहीं महिलाओं को स्पोर्ट्स मैदान में देखने की इजाज़त भी मिल गयी. देश में सिनेमा फिर से खुल गया और कई तरह के बड़े सुधार हुए. इन सभी सुधारों को सऊदी सरकार ने विज़न २०३० के चोले में रक्खा.

सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था लम्बे समय से तेल पर निर्भर है और इसकी निर्भरता को तेल से हटाने के लिए अलग-अलग तरह की इंडस्ट्री का विकास, इस कारण विज़न २०३० प्रोग्राम लांच किया गया था. जहाँ सऊदी सरकार के आर्थिक उदारवादी रवैये की फ़्रांस, संयुक्त राज्य अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों ने तारीफ़ की वहीं पिछले कुछ समय में हुई घटनाओं ने मुहम्मद बिन सलमान का एक अलग ही चेहरा दिखाया है.

मुहम्मद बिन सलमान ने अपने कार्यकाल में यमन में चल रहे गृह युद्ध में हमेशा सक्रिय भूमिका निभायी, कई बार सऊदी अरब की आलोचना भी हुई कि वो युद्ध ख़त्म करने की कोई कोशिश नहीं कर रहा है. इसी तरह से उसकी फ़िलिस्तीन के प्रति नीति भी साफ़ नहीं रही. मुहम्मद बिन सलमान ने कभी फ़िलिस्तीनी लोगों को ख़ुश करने के लिए बयान दे दिए तो कभी इज़राइल के पक्ष की बात कर दी. ये सब किसी तरह चल ही रहा था कि गत २ अक्टूबर को एक ऐसा मामला हुआ जिसने पूरी दुनिया को हिला दिया.

ये मामला है एक वरिष्ट पत्रकार के सऊदी कांसुलेट से ग़ायब हो जाने का. सऊदी नागरिक जमाल खाशोग्गी 2 अक्टूबर को तुर्की के इस्तांबुल में स्थित सऊदी कांसुलेट में किसी निजी काम से गए थे लेकिन उसके बाद वो वहाँ से कभी वापिस नहीं लौटे. ऐसा कहा जा रहा है कि सऊदी एजेंट्स ने उनका कांसुलेट के अन्दर ही मर-डर कर दिया. ये विएना कन्वेंशन का घोर उल्लंघन है. हालाँकि सऊदी सरकार ये कह रही है कि इसमें उसका कोई हाथ नहीं है लेकिन जिस तरह से उसने जाँच अधिकारियों को कांसुलेट में नहीं जाने दिया और हर एक काम में देर लगायी. इससे भी बड़ी बात कि cctv फुटेज भी वो नहीं प्रस्तुत कर सकी, इससे साबित है कि सऊदी अरब की सरकार बहुत कुछ छुपाने की कोशिश कर रही है.

इस पूरे मुआमले में एक बात ये भी साफ़ हो गयी है कि सऊदी क्राउन प्रिंस की जो छवि सऊदी मीडिया ने बनायी है वो उससे अलग हैं. जमाल खाशोग्गी दा वाशिंगटन पोस्ट में काम करने वाले एक ऐसे पत्रकार थे जो लगातार सऊदी अरब की सरकार की आलोचना करते थे. सवाल ये है कि क्या ताक़तवर सऊदी क्राउन प्रिंस से ज़रा सी आलोचना बर्दाश्त नहीं हुई. या फिर ये एक सबक़ देने के लिहाज़ से किया गया है कि जो भी हमारे ख़िलाफ़ बोलेगा, लिखेगा..उसका यही अंजाम होगा.

इस मामले में जहाँ सऊदी क्राउन प्रिंस की भरसक आलोचना हो रही है वहीं संयुक्त राज्य अमरीका उन्हें बचाने की पूरी कोशिश कर रहा है. अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने ही नेताओं के सामने क्राउन प्रिंस के लिए रहम माँग रहे हैं.

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