मुसलमानों के रुझान से आरएसएस हुई परेशान

November 11, 2018 by No Comments

नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का कहना है कि हिंदुत्व एक सर्वसम्मत विचार है जो परम्परा से चला आ रहा है. ये विचार विविधता के सम्मान की वजह से चल रहा है.दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यान माला के दूसरे दिन ‘भविष्य का भारत’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने हिंदुत्व के बारे में चर्चा की. उन्होंने कहा कि वैदिक काल में हिंदू नाम का कोई धर्म नहीं था बल्कि सनातन धर्म हुआ करता था. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि संघ मुसलमानों के खिलाफ नहीं है। वह ऐसे हिंदुत्व की बात करते हैं जिसमें मुसलमानों के साथ सभी वर्गों के लोग एक साथ रह सकते हों। इसे भागवत की आरएसएस की परंपरागत ‘कट्टर हिंदूवादी छवि’ को बदलने की कोशिश के तौर पर देखा गया। इसी क्रम पर चलते हुए मोहन भागवत ने एक बार फिर इसाई अल्पसंख्यकों के प्रति अपने नरम रुख का परिचय दिया है।

मोहन भागवत का कहना था कि आज जो कुछ हो रहा है वो धर्म नहीं है. “जिस दिन हम कहेंगे कि हमें मुसलमान नहीं चाहिए उस दिन हिंदुत्व नहीं रहेगा.” उन्होंने शिक्षाविद्द सर सय्यद अहमद ख़ान का उद्धरण देते हुए कहा कि जब उन्होंने यानी ख़ान ने बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी की तो लाहौर में आर्य समाज ने उनका अभिनंदन किया. आर्य समाज ने इसलिए अभिनन्दन किया था क्योंकि सर सय्यद अहमद ख़ान मुस्लिम समुदाय के पहले छात्र थे जिन्होंने बैरिस्टर बनने की पढ़ाई की थी.भागवत बताते हैं, “उस समारोह में सर सय्यद अहमद ख़ान ने कहा कि मुझे दुःख है कि आप लोगों ने मुझे अपनों में शुमार नहीं किया.”

मोहन भागवत के इस बयान पर कांग्रेस नेता राशिद अल्वी इसे आरएसएस की चुनावी चाल बताते हैं। उन्होंने कहा कि जब से सरकार सत्ता में आई है, उसने लगातार अल्पसंख्यकों के प्रति कटुतापूर्ण माहौल बनाने की कोशिश की। अनेक ऐसे फैसले हुए जो अल्पसंख्यकों की भावनाओं को चोट पहुंचाने वाले थे। वही दूसरी तरफ भागवत ने साफ़ कर दिया कि ये एक जीवन पद्धति और सांस्कृतिक विरासत और सभ्यता से जुड़ी अवधारणा है जिसमें सभी धर्मों को समान और सम्मानित स्थान प्राप्त है. उन्होंने देश के सामने जिस प्रश्न को विमर्श के लिए छोड़ा है वह भारत के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण है.अंग्रेजों के आने से पूर्व भारत में वह सभी धर्म थे जो आज हैं परंतु बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक जैसा विभाजन नहीं था.ये विभाजन अंग्रेजों ने पैदा किया, जिसका उद्देश्य ‘बांटो और राज करो’ था. ये अवधारणा हमारे मन-मस्तिष्क, विमर्श और संविधान से समाप्त हो, यह आवश्यक है.यह बात तो भारत के संविधान सभा में भी स्वयं मुस्लिम लीग के नेता तजामुल हुसैन ने भी कही थी.

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