सामाजिक कार्यकर्ता हरिभान यादव ने पूछा सवाल-‘क्या ऐसे रुकेगा कोरोना?’

May 21, 2020 by No Comments

शायद मानव सभ्यता के इतिहास में यह पहला अवसर होगा कि किसी महामारी के डर से इतने बड़े पैमाने पर श्रमिक वर्ग अपने कार्यस्थलों से अपने गाँव-घर की ओर भाग रहा है । चूँकि दुनिया ग्लोबल विलेज हो चुकी है अतः अब किसी भी प्रकार के संक्रमण को एक स्थान पर रोकना आसान नहीं है।कोरोना covid-19 एक संक्रमणशील एवं प्रकृति बदलने वाला वायरस है । इसकी चपेट में आने से बचने के लिए हमारे पास कोई वैक्सीन अथवा प्रतिरक्षा व्यवस्था वर्तमान में उपलब्ध नहीं है । इस प्रकार की परिस्थिति में अपने आप को अन्य लोगो से दूर रखना ही बचाव का प्राथमिक और सबसे आसान तरीका है ।

भारत जैसे अत्याधिक जनसंख्या वाले देश में यह कार्य बहुत ही कठिन है । जहाँ पर महानगरों में सुबह की शुरुआत ही लाइन में लगकर सार्वजानिक शौचालय का प्रयोग करना ही वर्ग विशेष के लिए एकमात्र विकल्प है । वहां अप्रतिरक्षित संक्रामक रोगों को कैसे रोका जा सकता है ? हमें प्रतिदिन यह जानकारी दी जा रही है कि मुंबई के धारावी इलाके में सबसे अधिक कोरोना संक्रमण फैलने की एवं मृत्युदर बहुत अधिक है । लेकिन क्या आपने यह विचार किया कि ऐसा क्यों है ? क्योंकि आपको यह व्यवस्था सोचने का अधिकार ही नहीं देती यदि आप सोचेंगे तो शोषण कि पर्तें खुलने लगेंगी । भारत में अधिकांश श्रमिक वर्ग इसी प्रकार का दैनिक जीवन व्यतीत करता है ।

उसके लिए अधिक लोगो से मिलना-जुलना और सार्वजनिक संसाधनों का प्रयोग करना मजबूरी है । यही कारण है कि जो कोरोना वायरस भारत में हवाई जहाज से आया, आज वह पैदल और साईकिल से चलने वाले लोगो का जीवन निगल रहा है । भारत में इसके कोई आधिकारिक आंकडे अब तक नहीं है कि कितने लोग लाकडाउन होने के बाद भूख से, भोजन के लिए भटकते-भटकते मर गए, कितने लोग शहरों से भाग कर अपने गांव/घरों को जाते हुए बड़ी-बड़ी गाडियों से कुचलकर मर गए, कितने बीमार लोग दवा के आभाव में मर गए और कितनो के ऐसे सपने मर गए जो उनके मृत जीवन के समान है । हाँ ! आंकड़े है, जो बड़ी दुर्घटनाए हुई हैं जैसे औरंगाबाद में रेल की पटरी पर कट कर मरे मजदूरों की, औरैया में हुए भीषण सड़क हादसे में मृत मजदूरों कि संख्या के । लेकिन जो घटनाएं बड़े स्तर पर मीडिया में नहीं आ रही हैं क्या उनके आंकड़े प्रशासन के पास हैं और सरकार हमें यह बता पायेगी कि इस महामारी के दौरान कोरोना से मरने वालों के साथ साथ कोरोना के डर से मरने वाले लोग कितने हैं ? सबसे बड़ी बात ये कि ये कौन लोग हैं जिनके जीवन-मरण, भरण-पोषण से सरकार को कोई सरोकार नहीं है ?

आइये देखते हैं ज़मीनी हकीकत –

महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में प्रवासी मजदूरों की बहुत बड़ी संख्या है जो वहां पर उत्तर भारत के राज्यों से नौकरी और मजदूरी करने जाते है । जब कोरोना संक्रमण कि वजह से तालाबंदी का फैसला सरकार ने लिया तो इनके भोजन और जीवन के विषय में नहीं सोचा गया जिसका परिणाम यह हुआ कि कुछ दिन तो ये श्रमिक पुलिस के डर से घरो में दुबके रहे, लेकिन कब तक रहते ?
सबसे पहले दिल्ली के आनंद विहार में मजदूर इकठ्ठा हुए उनमे से अधिकांश यूपी के थे जिन्हें यूपी सरकार की बसों का इंतज़ार था लेकिन उनमे से आधे से अधिक लोगो को सरकारी सेवा के माध्यम से नहीं बल्कि स्वयंसेवा से घरों की ओर निकलना पड़ा जिनमे से पहली बार मजदूरों की सड़क पर मृत्यु की ख़बरें आने लगी ।
इसके बाद सूरत में लगभग 3000 श्रमिको का हंगामा सड़क पर शुरू हो गया जिसे पुलिस के बल पर कुचलने का प्रयास किया गया । जिसके बाद भूखे मजदूरों का वहां से स्वयं ही बिना संसाधनों के निकलना शुरू हो गया और अपने घरों तक पहुचने के पहले ही कितने दुनिया छोड़ गए ।
फिर मुंबई में मजदूर वर्ग अपने घर जाने के लिए बड़ी संख्या में सड़को पर उतर आता है इनके लिए भी कोई समुचित व्यवस्था सरकारों के पास नहीं होती है । लॉकडाउन लागू हुए अब तक लगभग 40 दिन बीत चुके थे । सरकारे भी मजदूरों को रोक-रोक कर थक सी गई और उनकी मांगो से छुटकारा पाने का विकल्प भी तलाश रही थीं ।
अतः अब गरीब विरोधी सरकारों का षड्यंत्र शुरू होता है पहले राष्ट्रीय राजमार्गो पर पुनः टोल शुल्क लेना शुरू किया जाता है उसके बाद राजस्व वसूलने का बड़ा फैसला आता है शराब की दुकाने खोलने का । शराब की दुकाने खुलने के साथ ही पुलिस प्रशासन लोगो को बहार निकलने के लिए अघोषित छूट दे देता है । इसके बाद भी सरकारों को धन की कमी मालूम पड़ती है तो पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ा दिए गए । अब तक देश की जनता का ऐसा दृश्य सामने आता है जैसा सरकार छह रही थी, घरों से आसानी से निकल कर शराबी लोग शराब खरीद रहे है, वाहनों में पेट्रोल-डीजल भरवा कर जरूरतमंद लोग अपने गाँव-घर की ओर निकलते हैं और टोल भी चुकाते हैं । यह है असली स्वरुप “जनता द्वारा जनता के लिए चुनी हुई जनता की सरकार का ।”
एक ओर जहाँ अमीर लोग मंहगा हवाई टिकट खरीद कर घर आ रहे थे और अमीरों के बच्चो के लिए विशेष बसें चलाई जा रही थी वही दूसरी ओर श्रमिको को पैदल, साईकिल से, मोटर साईकिल से, इनके निजी तीन और चार पहिया वाहन से तथा बसों-ट्रकों से अपने गाँव घर जाने के लिए छोड़ दिया जाता है इस पर भी शोषण समाप्त नहीं होता, ऑनलाइन माइग्रेसन पास का ढोंग चालू रहता है । कितने मजदूर ऑनलाइन माइग्रेसन और आरोग्य सेतु एप्प का प्रयोग कर सकते है । जहाँ एक ओर सड़क मार्ग द्वारा अपने खर्चे पर श्रमिको को घर जाना पड़ रहा है वही बिना पास वाले लोगो से कहीं-कहीं पुलिस वसूली भी करती पायी गई ।

सरकार द्वारा रेल संचालन शर्तों के साथ तथा सीमित रूप से शुरू किया गया जिसमें मंहगा और मात्र ऑनलाइन टिकट मान्य है । अब सोचिए जो दिहाड़ी श्रमिक दो माह से बिना काम के बैठा था वह किस प्रकार से इस रेल का सफ़र करके अपने घर पहुंच पायेगा जबकि ऐसी सूचनाएं मिली कि स्वास्थ प्रमाणपत्र के नाम पर मात्र थर्मल स्क्रीनिंग की जा रही है और उसके लिए गुजरात में कहीं-कहीं 600 और महाराष्ट्र में 300 तक रूपये लिए गए ।
जैसे तैसे रेल का सफ़र करके लखनऊ पहुँचने वाले दो यात्रियों को ट्रेन में ही मृत पाया गया । जिसमें से एक अयोध्या निवासी व्यक्ति के दाह संस्कार के बाद आई रिपोर्ट के आधार पर कोरोना पॉजिटिव बताया गया । उत्तर प्रदेश में अधिकांश ऐसे मामले आ रहे हैं जिनमे मृत्यु के बाद लिए गए सैम्पलो में कोरोना की पुष्टि हुई है । यूपी में क्वारंटीन के नियमों का पालन भी ठीक से नहीं हो रहा है यहाँ 14 दिन तो बहुत कम लोग ही क्वारंटीन सेंटर पर रह रहे हैं तथा उनमें से 14 दिनों तक रहने वाले लोगो को सरकारी अनाज की किट भी नहीं दी जा रही है । पैदल, निजी वाहनों से एवं बसों-ट्रकों से दूसरे प्रदेशो से आने वाले लोगो की जाँच के नाम पर दूसरे-तीसरे दिन ब्लाक पर बुला कर मात्र थर्मल स्क्रीनिंग हो रही है । ऐसे में किस प्रकार कोरोना के संक्रमितो का पता समय रहते चलेगा ?

ये है जमीनी हकीकत ! क्या ऐसे रुकेगा कोरोना ? जब से प्रवासी मजदूर प्रदेश में अपने घरो को वापस आने लगे हैं तब से यूपी में कोरोना के आंकड़े बहुत तेजी से बढ़े हैं इसके बाद भी सरकार तथा स्थानीय प्रशासन सुस्त है जिम्मेदार लोग सिर्फ धन कमाने एवं धन बचाने में व्यस्त हैं, मजदूरों और गरीबो कि चिंता किसे है ?

हरिभान यादव
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं bhartiyemedia.com के प्रबंध संपादक हैं)

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