व्यंग्यकार अमोल सरोज से एक ख़ास बातचीत: “फ़ेसबुक से पहले मैंने कुछ नहीं लिखा था…”

November 4, 2017 by No Comments

इसी साल व्यंग्यकार अमोल सरोज की पहली किताब प्रकाशित हुई है.”अमोल सरोज स्टेटस वाला” नाम की इस किताब का कांसेप्ट और इसकी पब्लिसिटी का तरीक़ा, दोनों ही बिलकुल अलग था.अमोल के मुताबिक़ उनकी किताब का विमोचन उनके लिए ही नहीं बल्कि उनके दोस्तों के लिए भी एक उत्सव की तरह रहा. उनकी किताब और ज़िन्दगी के बारे में हमने उनसे कुछ बातें कीं.

सबसे पहला सवाल तो मेरा आपसे यही है कि लेखन की शुरुआत कैसे हुई?
अमोल सरोज: फेसबुक से । फेसबुक से पहले मैंने कुछ नही लिखा था कभी लिखने के बारे में सोचा भी नही था,हाँ पढ़ने का शौक़ बचपन से है.

क्या पढ़ते थे बचपन में.. मेरा कहने का मतलब है किस क़िस्म के साहित्य में आपकी रूचि रही?
अमोल सरोज:शुरुआत तो नंदन,चम्पक से ही हुई थी कॉमिक्स के बाद क्राइम फिक्शन बहुत पढा जिसे यहाँ लुगदी साहित्य कहा जाता है । भिवानी में लाइब्रेरी है बहुत बड़ी नौंवी में उसका सदस्य बनने के बाद प्रेमचन्द विमल मित्र से जान पहचान हुई पर साहित्य के बारे में ज्यादा न पता होने की वजह से ज्यादा लेखकों को नही पढ़ सका। कृष्ण चन्द्र को खूब पढा । फिर पोएट्री की तरफ रुझान हुआ दिल्ली आकर उर्दू शायरी जमकर पढ़ी एक दो साल

आपकी किताब जो इसी साल मंज़र ए आम पर आयी है, एक व्यंग्य-साहित्य है.. व्यंग्य में आपकी रूचि कैसे हुई?
अमोल सरोज:मैंने लिखने की शुरुआत शायरी से की थी। पर जल्द ही समझ आ गया कि शायरी के लिए जिस मेहनत और संयम की जरुरत है वो शायद मैं न दे पाउ तो शायरी करना बंद कर दिया था। 2012 के उस मौहाल में जब बच्चा बच्चा पोलटिक्स पर लिख रहा था। क्रांति में शरीक हो रहा था। मैं भी उसी भीड़ का हिस्सा था। मेरे लिखने में बदलाव मुझे तब महसूस हुआ जब मैंने हरिशंकर परसाई को पढ़ा। 2013 में उन्हें लगातार एक साल पढ़ने के बाद जब मैंने लिखा तो मुझे अपना लिखा थोड़ा थोड़ा पसंद आने लगा। हरिशंकर परसाई के वयंग्य और मेरे अंदर संवदेनशीलता दोनों ने मिलकर मेरे व्यंग्य लेखन की आधार शिला रखी। लगातार लिखने और पढ़ने की वजह से लेखन में साल दर साल थोड़ा थोड़ा सुधार आता गया। आज न केवल मेरी एक किताब आ चुकी है बल्कि एक मासिक पत्रिका में नियमित व्यंग्य लिखने का मौका भी मिला है।

बड़ी ख़ुशी की बात है ये तो, आपकी किताब “अमोल सरोज स्टेटस वाला”, नाम से ही ज़ाहिर है कि सोशल मीडिया और ख़ासतौर से फ़ेसबुक के क़रीब है… इस तरह की किताब प्रकाशित करने का विचार कैसे आया, यूँ कहूं कि अपने स्टेटस को compile करके एक किताब का रूप देने का कब ख़याल आया
अमोल सरोज:मेरी किताब फेसबुक पर लिखे स्टेटसों का ही संकलन है। इस साल की शुरुआत में ही मेरे मन में सब स्टेटस एकत्रित करके एक ईबुक का ख्याल दिल में आया था तीन चार दिन में जब संकलन पूरा हुआ तो मुझे लगा ये किताब के रूप में छपनी चाहिए। मैंने उसे अपने सभी नजदीकी दोस्तों को पढ़वाया सबका सकारात्मक जवाब आने पर मैंने किताब छपवाने का पक्का मन बना लिया

कहते हैं कि किताब लिखने से ज़्यादा मुश्किल एक नए लेखक के लिए किताब छपवाना है.. आपके केस में क्या मुश्किलात आयीं? या आसानी से ही छप गयी आपकी किताब ?
अमोल सरोज:मेरे लिए थोड़ा आसान था क्योंकि मेरे दोस्त मेरे साथ थे। मेरे सब दोस्त इतने ज़्यादा इन्वॉल्व थे कि मुझे ज़्यादा कुछ नहीं करना पड़ा। शुरुआत में एक दो प्रकाशकों से बात हुई पर बात न बनने पर हमने सेल्फ पब्लिशिंग और सेल्फ पब्लिसिटी का रास्ता चुना। किताब की एडिटिंग से लेकर कवर डिजाइन तक सब दोस्तों ने किया। दरअसल हम सब दोस्तों के लिए इस किताब का विमोचन एक उत्सव जैसा साबित हुआ जिसमें सबको ख़ूब मज़े आये।

आप हरियाणा से ताल्लुक़ रखते हैं और पेशे से एक CA भी हैं… लेकिन ये सफ़र भी आपका आसान नहीं रहा.. कुछ बातें ज़ाती ज़िन्दगी के बारे में बताएं..
अमोल सरोज:हरियाणा में पढ़ने लिखने के नाम पर सिर्फ़ स्कूल की पढाई ही है इसलिए कभी लिखने जैसा ख़याल दिल में भी नहीं आया। मुश्किल आसान जैसा कुछ लगा नहीं। सीए करने के सिवाय और कोई ऑप्शन नहीं था। अगर फेसबुक न होती तो शायद कभी लिख भी नहीं पाता। चूँकि हरियाणा की भाषा में तंज़, व्यंग्य बहुत ज़्यादा होते है शायद मेरे व्यंग्य लिखने में इस बात ने मदद की हो। शुरुआत में फेसबुक पर जो दोस्त बने वो सब ऑरकुट पर एक ग्रुप से पहले से जुड़े हुए थे जहाँ उन सब ने शायरी सीखी। मुझे इस बात का ज़रूर अफ़सोस होता है कि उन दोस्तों से ऑरकुट के वक़्त मुलाक़ात नहीं हुई।

लेखकों के साथ आजकल एक समस्या ये भी है कि वो जब कुछ लिखते हैं तो ज़रा सा किसी विचारधारा के इधर उधर होता है तो लेखकों को धमकियां मिलनी शुरू हो जाती हैं. कितना मुश्किल है इस दौर में अपने मन की बात लिखना.. ?
अमोल सरोज:लेखकों को धमकियों और मारने का सिलसिला आज का नहीं है। विरोध के स्वर को दबाने की कोशिश हमेशा से होती रही है। अब चूँकि संवाद ज़्यादा बढ़ा है तो इस तरह की घटनाओ में भी बढ़ोतरी आयी है। मुझे निजी तौर पर लगता है हमारे समाज में लोकतंत्र की समझ बहुत कम है। बग़ैर लोकतंत्र की समझ को समाज में विकसित किये इस तरह की घटनाओ को कम नहीं किया जा सकता।

आपकी अगली किताब कब तक आने की उम्मीद है?
अमोल सरोज:अगली किताब के बारे में अभी सोचा नहीं है। कब आएगी अभी कहना मुमकिन नहीं है। लिखना अगर जारी रहा तो किताब भी देर सवेर आ ही जानी है

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