इन शर्तो के बगैर दुआ कबूल नही होती है….हर किसी को ये बात जानना है ज़रूरी है

March 30, 2019 by No Comments

तौबा अल्लाह ताला की बारगाह में एक अज़ीमुश्शान मुबारक अमल है कि बंदा अपने तमाम गुनाहों,बुराईयों और नाफ़रमानियों से शर्मिंदा और ताइब हो कर उस की बंदगी इख़तियार करना चाहता है।चुनांचे बुज़ुर्गों ने अपने अपने तरीक़ पर तौबा की मुख़्तलिफ़ शराइत बयान की हैं,ये शराइत ऐसी हैं कि जिन पर पूरा उतरने के बाद तौबा की क़बूलीयत यक़ीनी हो जाती है।
ताहम शरीयत ने ऐसी कोई अलामत या निशानी बयान नहीं की जिससे इन्सान यक़ीनी तौर पर जान सके कि मेरी तौबा क़बूल हुई है या नहीं।ये अल्लाह ताला का फ़ैसला और वही उस का हक़ीक़ी इलम रखता है।हक़ीक़त में तौबा वही है जो ज़बान से अदा हो कर क़लब-ओ-रूह की गहिराईयों में उतर जाये और बंदे की बाक़ी ज़िंदगी की काया पलट कर रख दे।

मुस्लिम


हक़ीक़ी तौबा के बाइस ताइब की तमाम लग़्ज़िशें, कोताहियों और तमाम गुनाह ख़ाह सगीरा हूँ या कबीरा यूं मिट जाते हैं जैसे वो अभी माँ के बतन से नोमोलूद बच्चे की तरह मासूम पैदा हुआ हो। उमूमी तौर पर तौबा की शराइत दर्ज जे़ल हैं जिन पर अमल पैरा हो कर इन्सान सच्ची तौबा की बरकात से दाइमी तौर पर मुस्तफ़ीज़ हो सकता है।..नदामत और शर्मिंदगी,गुनाह छोड़ने का इरादा,तौबा पर पुख़्ता रहने का अज़म,इस्लाह-ए-अहवाल इख़लास
तौबा की पहली और बुनियादी शर्त ये है कि इन्सान अपने बुरे तौर तरीक़ों और आमाल पर शदीद पशेमानी और शर्मिंदगी महसूस करे।ये नदामत दरअसल बुरे कामों से किनारा-कशी की तरफ़ पहला क़दम है।नदामत के सही होने की अलामात में दिल का नरम हो जाना और कसरत से आँसूओं का जारी होना है क्योंकि जब दिल को अल्लाह और अल्लाह के महबूब रसूल सललल्लाहु अलैहि वाला वसल्लम की नाराज़गी का एहसास जकड़ ले और इस पर अज़ाब का ख़ौफ़ तारी हो जाये तो ये गिर्ये-ओ-ज़ारी करने वाला और ग़मज़दा हो जाता है।

मुसलमान


तौबा के अमल में दाख़िल होने का ये पहला क़दम है कि इन्सान नदामत महसूस करते हुए हर किस्म के गुनाह से किनारा-कश हो जाये।बुरे फे़अल पर शर्मिंदगी और पशेमानी के एहसास से बंदे के दिल में गुनाह तर्क करने का इरादा जन्म लेता है और बंदा शर्म महसूस करता है कि अल्लाह ताला की एक कमज़ोर और हक़ीर तरीन मख़लूक़ हो कर उस के साथ अपने ताल्लुक़-ए-बंदगी की हया ना की,इस के अहकाम की ख़िलाफ़ वरज़ी का मुर्तक़िबहुआ।ये एहसास तर्क-ए-गुनाह पर मुंतिज होता है।
इन्सान अल्लाह तबारक ताला के हुज़ूर पुख़्ता अह्द करे कि जिन ना-फ़रमानियों, ख़ताओं और गुनाहों का इर्तिकाब कर चुका है आइन्दा ये उस की ज़िंदगी में कभी दाख़िल नहीं होंगे क्योंकि तौबा की अबदी सलामती का इन्हिसार इस पर है कि वो किस क़दर अपने अह्द पर पुख़्ता रहता है।तौबा की ये शर्त ताइब से अगले मरहले का तक़ाज़ा करती है और वो मरहला सँवर जाने यानी इस्लाह-ए-अहवाल का है।
हक़ीक़ी नदामत इन्सान के अंदर एक हमागीर तबदीली को जन्म देती है।नदामत सिर्फ़ तौबा के अलफ़ाज़ अदा करने और ख़ाली आँसू बहाने का नाम नहीं। नदामत और इस के नतीजा में तौबा का इख़तियार कर लेना अहवाल-ए-हयात का मुकम्मल तौर पर तबदील हो जाना है।जब तक तौबा करने वाला इस्लाह की फ़िक्र नहीं करता वो ताइब ही नहीं होता।
गुनाहों से शर्मिंदगी के बाइस आँखों का अश्क होना भी क़ीमत पा सकता है,अगर उस के नतीजे में इन्सान की ज़िंदगी से अल्लाह ताला की ना-फ़रमानी, फ़िस्क़-ओ-फ़ुजूर,ज़ुलम-ओ-नाइंसाफ़ी,शहवत और हवस परसती जैसे बुराई ख़ारिज हो जाएं और इन्सान गुनाहों से यकसर पाक हो कर इताअत-ओ-बंदगी का पैकर बन जाये।

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