सोशल मीडिया पर कमज़ोर होती मोदी की पकड़; कई जातियों का हो रहा है “मोह-भंग”

2014 के पहले और उसके बाद के कुछ महीनों के पीरियड में ऐसी स्थिति थी कि कोई भी सोशल मीडिया पर अगर भाजपा या नरेंद्र मोदी की बुराई करता तो पलट कर उसे जवाब तुरंत मिल जाता. ये वो दौर था जब आम लोग भी मोदी के लिए झगड़ा करने को उतारू थे,भाजपा कार्यकर्ताओं को तो क्या ही कहेंगे.

हमने जो आंकलन किया है उसके मुताबिक़ मुस्लिम समाज के लोग उस पीरियड में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते थे लेकिन कोई अन्य समाज खुल कर मोदी का विरोध नहीं कर पाता था. मुस्लिम के इलावा वामपंथी और कुछ दलित चिन्तक ज़रूर भाजपा की नीतियों के ख़िलाफ़ तब भी थे और जो चुनावी बातें कही जा रही थीं उन्हें सिर्फ़ जुमला मानते थे. सोशल मीडिया के बाहर कोई अलग स्थिति नहीं थी. हालाँकि ऐसा नहीं है कि दूसरे समाज में मोदी की आलोचना करने वाले लोग नहीं थे. कुछ तो थे ही लेकिन बहुत कम थे.

अब मगर ऐसा लगता है कि सोशल मीडिया पर मोदी अपनी पुरानी पकड़ खो चुके हैं. अब फेसबुक पर “अन्य पिछड़ा वर्ग” में आने वाली जातियों के लोगों ने मोदी का दामन छोड़ दिया है और मोदी विरोध पर आ गए हैं. इसमें अधिकतर वही लोग हैं जिन्हें मोदी से बहुत उमीदें थीं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की योजनाएँ उनको ख़ुश नहीं कर सकीं. “अन्य पिछड़ा वर्ग” के इलावा अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जन-जातियाँ भी मोदी का दामन सोशल मीडिया पर छोड़ चुकी हैं. अब ये लगभग तय रहता है कि अगर कोई कमेंट या फ़ेसबुक पोस्ट भाजपा के समर्थन की है तो वह इनमें से किसी समाज की नहीं होती. अगर प्रोफाइल असली नज़र आ रहा है तो वो प्रोफाइल तो ये बात तय ही है. ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार के प्रति नाराज़गी दूसरी जातियों में नहीं है लेकिन अभी भी इन जातियों के लोग कुछ हद तक मोदी को पसंद करते हैं.

ऐसा हो सकता है कि लोकसभा चुनाव आते आते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पॉपुलैरिटी में इज़ाफ़ा हो जाए लेकिन फ़िलहाल तो ऐसा ही लगता है कि अनुसूचित जातियों-जनजातियों समेत कई जातियों का मोह मोदी से भंग हो चुका है.

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