हिन्दू-मुसलमान की ज़मीन पर लड़ी जा रही है औरत की आज़ादी की लड़ाई- अमोल सरोज

December 15, 2017 by No Comments

पिछले हफ्ते एक वीडियो आया जिसमें एक आदमी दूसरे आदमी को बेरहमी से मार रहा है। मेरी वीडियो देखने की इच्छा नहीं हुई मैंने नहीं देखा। पिछले दो दिनों में बलात्कार और हत्या की दो और ऐसी ही दिल हिलाने वाली घटनाएँ सामने आयी हैं। हिसार में एक पाँच साल की बच्ची की लाश मिली जिसका बलात्कार हुआ था। अभी आरोपी पकडे नहीं गए हैं। लखनऊ में एक 16 साल की लड़की का गैंग रेप किया गया जो पिछले दस साल से कैंसर से पीड़ित थी।

हिंसा की ऐसी वारदातें एक शांतिप्रिय इंसान को अंदर तक हिला देती है। ग़ुस्से से लेकर दुःख दर्द तक की प्रतिक्रियाएँ हम हर बार देते हैं। कुछ जायज़ कुछ नाजायज़। पर ये घटनायें इतनी ज्यादा हो रही है कि समझ नहीं आता कि क्या प्रतिक्रिया दें । प्रतिक्रियाओं में हम इतने भावुक हो जाते हैं कि भावुकता और मूर्खता के फ़र्क़ को भूल जाते हैं। एक बलात्कार की घटना पर एक स्टेटस पढ़ा कि लड़कियों को गर्भ में ही मार देना चाहिए। राजसमंद घटना के लिए भी ऐसे ही स्टेटस आये कि मुसलमानों को देश छोड़कर किसी अच्छे देश की तरफ रुख़ कर देना चाहिए। दोनों ही प्रतिक्रिया भले ही दुःख दर्द और संवेदनशीलता के कारण आयी हों पर दोनों ही पीड़ित के ही खिलाफ है। लड़कियों के गर्भ से बाहर न आने देने की हमारे यहाँ पुरानी परम्परा है। इसके इलावा जो प्रतिक्रियायें आती है वो भी बहुत ही अमानवीय और ग़ैर-लोकतान्त्रिक होती है जिसका हर्जाना भी देश के सबसे निचले पायदान पर खड़े नागरिक को ही भुगतना पड़ता है। गुड़गांव का प्रद्युम्न हत्याकांड इस का ताज़ा उदारहण है। जिसमें पुलिस ने ड्राइवर अशोक को घटना के बाद पकड़ लिया , मीडिया ने उसे दोषी घोषित कर दिया और फिर समाज से लिंग काटने से लेकर सर काटने तक की माँग आने लगी। यहाँ तक कि वहां के वकील एसोशिएशन ने अशोक कुमार का केस न लड़ने तक का एक फरमान भी जारी कर दिया। अगर प्रद्युमन के पिता सीबीआई इन्क्वारी की ज़िद न करते तो शायद अशोक कुमार आज भी सलाखों के पीछे होते। मैं फ़िलहाल इस बहस में नहीं पड़ना चाहता हूँ कि कड़ी सजा से इन घटनाओं में कमी आ सकती है या नहीं पर मेरा सवाल ये है कि क्या देश के पास ऐसी व्यवस्था है जो उन लोगों को जेल जाने से रोक सके जिन्होंने अपराध नहीं किया है ?

अगर बलात्कार की बात करें तो क्या इसके पीछे की राजनीति की बात नहीं की जानी चाहिए? हिंसा राजनीती का अहम् हथियार है। किसी लड़की के बलात्कार के पीछे भले ही कुछ लोगों के व्यक्तिगत दुःसाहस हो पर इसे जीवन भर का नासूर बनाना एक सोची समझी साजिश है जिसकी वजह से आधी आबादी को दबाया जा सकता है, दबाया जा रहा है। एक फ़ेमस फ़िल्मी डायलॉग है कि अगर तुम्हारी माँ बहन के साथ ये होता तो ? तुम्हारे घर माँ बहन नहीं है क्या ? माँ बहन को क़ुदरतन पुरुष की प्रॉपर्टी मान लिया गया है। हॉनर किलिंग से लेकर रेप पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले लोग औरत की आजादी के सवाल पर शातिरता से कन्नी काट जाते है। अधिकतर लोग अपनी बहन के उसके प्रेमी के साथ होने की कल्पना नहीं कर पाते। “लव-जिहाद” को समर्थन करने से बेहतर है देश में,अपने घर में ऐसा माहौल तैयार किया जाए जिसमें घर की औरतों को प्यार करने के लिए सोचना नहीं पड़े। किसी लड़की को इस बात के लिए ब्लेकमेल नहीं होना पड़े कि उसकी फोटो या सीडी घर दिखा दी जाएंगी। इज्जत या बेइज़्ज़ती का स्वैच्छिक या जबरन सेक्स से कोई लेना देना नहीं है। जब तक औरत आजादी की बात अपने घर से शुरू नहीं की जायेगी तब तक सारी बातें बेमानी है।

हमारा समाज किस क़दर बीमार है इसका पता इसी बात से लग सकता है कि आरोपी शम्भुलाल रैगर की पत्नी के अकाउंट में देश भर से पैसे जमा हो रहे हैं। मासूम लोग अपने पास उदारहण लिए फिरते है कि जब मुसलमानों ने प्यार कर रहे जोड़े को मार दिया था। हमारी तर्क प्रणाली यही बन गयी है कि ज्यादा ग़लत को थोड़े ग़लत से तुलना कर सब तरह के ग़लत को न्यायसंगत बना दिया जाता है। ये जितना भयावय दिख रहा है उससे कहीं ज़्यादा भयावय है। रही सही कसर लोवर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए जा रहे फ़ैसले पूरी कर रहे है। हादिया के केस में जिस तरह के निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने दिए वो बता रहा है कि समाज के तौर पर हम कहाँ जा रहे है।

जब तक ये लड़ाई औरत की आज़ादी की बजाय हिन्दू-मुसलमान की ज़मीन पर लड़ी जाएगी तब तक हमारी हार तय है। यकीन मानिये अगर देश की औरतें सही मायने में आज़ादी का मतलब जान पाई तो देश में हिन्दू मुसलमान भी नहीं लड़ाई भी नहीं रहनी है। हिन्दू मुसलमान ही नहीं रहने है।

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अमोल सरोज
अमोल सरोज “अमोल सरोज स्टेटस वाला” के लेखक हैं.

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