तत्पर पत्रकारिता से डब्बू पत्रकारिता तक ।

आज पत्रकारिता दिवस के मौके पर, आपको लग्नशील पत्रकारिता के एक ऐसे घटना से आपको रूबरू कराते है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव आज के समाज और राजनीति पर है ना सिर्फ भारत की बल्कि पाकिस्तान तक की राजनीति पर है । वह घटना जो अगर कागज़ से निकल असलियत का रूप धारण कर लेती तब आज की सच्चाई अलग होती । वह तथ्य जिसका सम्बंध अंग्रेज़, कश्मीर और भारत की तक़दीर से है, साथ ही जिसमें अहम योगदान है पत्रकारिता का, आज के भारत के स्थिति गढ़ने में ।

इसकी जानकारी हमें शशि थरूर द्वारा लिखी उनकी किताब ‘An Era Of Darkness’ से मिलती है ।

‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ की स्थापना 1868, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा हुई थी । इसके द्वारा की गई पत्रकारिता ने भारत के भविष्य का रुख़ मोड़ दिया । सन् 1891 का था, ब्रितानी भारत की राजधानी कलकत्ता थी और वायसरॉय थे लॉर्ड लैंसडौन । रोज की तरह उनके दफ़्तर से रद्दी कागज़ कूड़े में फेंके गए पर पत्रिका के एक पत्रकार ने उस रद्दी से एक खबर जानी और वह खबर थी वायसरॉय द्वारा जम्मू और कश्मीर पर कब्जे की । यह खबर पत्रिका ने अपने पहले पन्ने पर छापी और अंग्रेज़ी हुकूमत और जम्मू-कश्मीर महाराज के होश उड़ गए । खबर पढ़ते ही महाराज तुरंत लदंन को रवाना हुए अपना राज बचाने के लिए । 

अगर वायसरॉय का यह नापाक मंसूबा कामयाब हो जाता तो आज के हालात क्या होते, शायद यह समय ही ना होती या जम्मू और कश्मीर का अलग रूप होता । ब्रितानी काल के इस किस्से से मालूम पड़ता है की तत्कालीन पत्रकारिता कितनी लग्न से अपने फर्ज को निभाती थी । डर और दमन का माहौल होने के बाद भी अपने कर्तव्य को निभाया ।

और आज के दौर में जब भारत एक लोकतंत्र है और बड़ी तकनीकी विकास हुआ है जहां खबर मिलने में वक्त नहीं लगता, तकनीक के दौर में भी हम जिस मुख्यधारा पत्रकारिता को देख रहे है वह कितनी निम्न, पिछड़ा, डरा हुआ, सांप्रदायिक, जातिवादी और पूंजीवादी है । वह अब सही खबर दिखाने से डरता है, सरकार से सवाल करने की हिम्मत नहीं रखता है ।

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