हजरत मोहम्मद(स.अ.व्.) फरमाते हैं की तीन चीज़ों में देर कभी ना किया करो, पहली चीज़ तो ज्यादा तर लोग करते हैं…

January 10, 2019 by No Comments

दोस्तों सैयद अमीनुल कादरी साहब अपने बयान में फरमाते हैं कि 1 हब्शिय औरत थी जो कि मस्जिद-ए-नबवी में झाड़ू लगाने और सफाई करने के लिए आती थी और एक दिन उसका इंतकाल हो गया तो लोगों ने सोचा कि रात के वक्त इसको दफन करेंगे असल में वह जमाना ऐसा था कि जिस का इंतकाल होता था फौरन लोग उसको दफन कर देते थे और हम लोगों के वहां यह रिवाज है कि इंतकाल हो जाता है तो पूरी पूरी रात रखे रहते हैं.
ईशा के बाद इंतकाल होता है तो सुबह को दफन करते हैं कोई पोते का इंतजार करता है, कोई नवासी का और इसी चक्कर में मिट्टी रखी रह जाती है जीते जी ना पोते को दादी से पड़ी थी और ना ही दादा से लेकिन मरने पर उसका इंतजार किया जाता है हालांकि हुकुम यह है की सुन्नत के मुताबिक मय्यत के बाद सिर्फ इतना टाइम लिया जाए जितना में आप मय्यत को नहला कर कफ़न पहना सके.

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दोस्तों अगर लोग ऐसा सोचे कि रात को लोगों की नींद खराब हो जाती है तो क्या जरूरी है की पूरी बारात मय्यत के साथ जाए जितने लोग साथ में हैं और मोहल्ले के लोग जाकर दफनाने लोगों की कसरत के लिए मय्यत को तकलीफ पहुंचाना सही नहीं है कुछ लोग तो ऐसे हैं जो अगर जुम्मे का दिन इंतकाल हो जाए तो नमाज ए जुमा के बाद जनाजे को दफनाते हैं.
मौलाना कहते हैं कि कुछ लोग यह कहते हुए नजर आते हैं कि जुम्मा मिल जाएगा जिसको जुमा मिलेगा मौलाना कहते हैं कि मैं पूछता हूं जिसने जीते जी जुमे की नमाज नहीं पढ़ी उसे मरने पर जुमा मिलेगा अब वह जुमा नहीं पढ़ सकता क्योंकि अब वह मर चुका है.

उन्होंने कहा कि अब उसके ऊपर जुम्मा फर्ज नहीं है क्योंकि वह मर चुका है और जिनको जुम्मा पढ़ना है वह पढ़ लेंगे मैयत का जुम्मे में से कोई ताल्लुक नहीं होता दोस्तों मौलाना ने कहा कि ऐसी जहालत ना किया करो जितनी जल्दी हो सके मुर्दे को दफन कर दिया करो यही सुन्नत है और मुर्दे के लिए भी यही ठीक होता है क्योंकि उसे जितनी देर करोगे उसे उतनी ही तकलीफ होगी.

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