थिएटर आर्टिस्ट महेश देवा से ख़ास बातचीत: मेरा मकसद अकेले आगे बढ़ना नहीं, सभी बच्चों को…

November 10, 2017 by No Comments

लखनऊ से ताल्लुक़ रखने वाले महेश चन्द्र देवा पेशे से कलाकार हैं और लखनऊ में ही एक थिएटर वर्कशॉप चलाते हैं. उन्होंने कई फ़िल्मों में करैक्टर रोल्स किये हैं और लगातार अलग-अलग क़िस्म के प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. अगले हफ़्ते रिलीज़ होने वाली फ़िल्म “शादी में ज़रूर आना” में भी उन्होंने एक किरदार किया है. उनके फ़िल्म और थिएटर के सफ़र पर भारत दुनिया की ओर से प्रियंका शर्मा ने उनसे  फ़ोन पर बात की. हम इस बातचीत का दूसरा भाग साझा कर रहे हैं:

 

प्रियंका: तो जो गरीब बच्चे पैसे नहीं दे पाते हैं, उन्हें आप कैसे पढ़ाते हैं, उनसे फीस लेते हैं या नहीं ?

महेश देवा: चबूतरा में हम किसी से भी फीस नहीं लेते हैं। चाहे वह गरीब हो या अमीर हो। देखिये, अगर कोई अमीर बच्चा भी हमारी पाठशाला में आता है तो हम उनसे फीस नहीं लेते हैं। साल में हम लोग एक बार प्रोग्राम करते हैं, तब हम उन्हें आने-जाने के लिए गाड़ी वगैरह का इंतज़ाम करने के लिए कह देते हैं या फिर अगर कॉस्ट्यूम की जरूरत पड़ी तो देख लीजियेगा।

उसके लिए भी हमने बच्चों के लिए चबूतरा में साप्ताहिकी गुल्लक बनवाई है, जिसमें उन्हें मिलने वाले एक-दो रूपये वह जोड़ते हैं। हर बच्चा इस तरह से पैसे जोड़ता था और इससे फेस्टिवल में बच्चों की जरूरतों की चीज़ें खरीदी जाती थी। अगर बच्चों को पढ़ने के लिए कापियां नहीं मिल रही। तब भी हम उस गुल्लक को तोड़कर बच्चों के लिए कापियां ला देते हैं। किसी के लिए किताब आ गई, तो किसी की फीस दे हो गई।

प्रियंका: आपने कभी अपने करियर के लिए लखनऊ से बाहर निकल कर मुंबई जाने का नहीं सोचा ?

महेश देवा: दो बार हम मुंबई गए थे, लेकिन पारिवारिक परेशानियां होने के कारण हमने सोचा कि लखनऊ में जाकर ही स्ट्रगल करते हैं। दरअसल अखिलेश यादव की सरकार का इसमें योगदान रहा है। उन्होंने सब्सिडी दी और लखनऊ में सिनेमा एस्टब्लिश हुआ। यहाँ पर मुंबई से लोग आये। हमने 17 सालों में 17 फ़िल्में का डाली हैं। इसके साथ हमने एक हॉलीवुड फिल्म भी की है। जिसका नाम है मिलियन डॉलर आर्म। जिसकी शूटिंग लखनऊ यूनिवर्सिटी में हुई है।

एक उत्तरी कोरिया की फिल्म थी, द प्रिंसेस ऑफ़ अयोध्या।  अभी भी तीन फ़िल्में कर रहा हूँ। जिनमें मैं रिषी कपूर, रजत कपूर और अजय देवगन के साथ काम कर रहा हूँ। शरमन जोशी के साथ एक फिल्म आ रही है, बबलू बैचलर। राज कुमार राव के साथ शादी में जरूर आना अभी रिलीज़ हो रही है। हाल ही में बाबूमोशाय बन्दूकबाज में हमने नवाज़्ज़ुद्दीन सिद्दीकी के साथ काम किया है। शोरगुल में हमने आशुतोष राणा जी के साथ काम किया है। अभी चाइल्ड इशू पर ही एक फिल्म है झलकी, जिसमें कैलाश सत्यार्थी का किरदार निभाया है बोमन ईरानी ने और मैं अखिलेन्द्र मिश्रा के साथ काम किया है। इसमें मेरा काफी अच्छा करैक्टर हैं।  ये फिल्म काफी फिल्म फेस्टिवल्स में जायेगी।

प्रियंका: लखनऊ में थियटर आने के बाद क्या अभी भी नए कलाकारों को रोजी-रोटी कमाने में दिक्कत आ रही है ?

महेश देवा: इसके लिए जो अखिलेश सरकार का योगदान रहा है। उसे तो भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन सरकार को मुंबई के सिनेमाकारों को भी सब्सिडी देनी चाहिए। जिससे फ़िल्में लगातार बढ़ेंगी।

जिससे यहाँ का युथ जो पलायन करके मुंबई जा रहा है, उसे ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वह अपने परिवार के पास रहकर स्ट्रगल करेगा। मैं 2013 से लगातार काम किया है। जब यहीं पर उनके लिए काम होगा तो युथ भटकेगा नहीं। दरअसल यूथ के साथ कभी कभी ये दिक्कत हो जाती है कि वे सीखना नहीं चाहते हैं। हम लोग थिएटर की दुनिया से काफी कुछ सीख कर आते हैं। लेकिन ग्लैमर की दुनिया में डायरेक्ट लोग जाना चाहते हैं। लेकिन जब आप बिना सीखे ग्लैमर की दुनिया में डायरेक्ट जाएंगे तो आप में कुछ खामियां होंगी। यूथ में ये अवेयरनेस है कि उन्हें खुद को एस्टब्लिश करना है। लेकिन उस इस्टैब्लिशमेंट में एक बैरियर भी है कि वह सीखना नहीं चाहते हैं। और जब तक वह सीख कर नहीं आएंगे, तब तक वह एस्टब्लिश नहीं हो सकते और आगे नहीं बढ़ सकते हैं। सिनेमा में करोड़ों लोग एक्टिंग करते हैं। हम जैसे लोगों के काफी सपने होते हैं। मैं एक करैक्टर आर्टिस्ट हूँ और इसी से अपना जीवन निर्वाह कर रहा हूँ।

प्रियंका: सिर, आपने कभी करैक्टर रोल्स सर मैं रोल में जाने के बारे में नहीं सोचा ?

महेश देवा: नहीं मैं अभी इस बारे में सोचा तो नहीं है, लेकिन अगर डिमांड आती है। जिसमें  मेरे जैसे करैक्टर फिट होते हैं। जैसे कोई प्रेमचंद की कहानी का फिल्मांकन करता है। जिसमें मेरी तरह के करैक्टर फिट होते हैं। तो हो सकता है मैं भी हीरो बन जाऊं। जैसे मांझी फिल्म है, उसमें नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का रोल था। एक कलाकार को बहुत सारी चीज़ों को करैक्टर में ढालना पड़ता है।

प्रियंका: आपके द्वारा चलाये जा रहे चबूतरा में थिएटर सीख रहे बच्चे कहीं काम कर रहे हैं ? उनके भविष्य को आप किस तरह से देखते हैं ?महेश देवा: चबूतरा थिएटर पाठशाला जब मैंने खोला था तो मेरा यही सपना था कि जिस तरह से मैं एक मुकाम सिनेमा में पाना चाहता हूँ। उस तर मैं चाहता था कि बच्चों को भी मैं सिनेमा में लेकर आऊं। इसके लिए मैं बहुत मेहनत कर रहा हूँ। लखनऊ में मेरे बहुत से दोस्तों को रिक्वेस्ट करता हूँ। कुछ ऐड और या फिल्मों में छोटे-मोटे रोल तो तो बच्चों को मौका दें। चबूतरा से जुड़े 30-35 बच्चों में फिल्मों में सीरियल में किरदारों को निभाया है।

कुछ पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक समाज के बच्चे हैं, जो टीवी देखते हैं, लेकिन उनका सपना होता है की वो भी ऐसे काम कर सकें। हाल ही मैं एक प्राइवेट बैंक के ऐड में हमारे कोऑर्डिनेटर ने दो-तीन बच्चों की बहुत मदद की। तो एक बड़ी अच्छी बात होती है, जब छोटे तबके के बच्चों इस बड़े लेवल पर काम करने का मौका मिलता है तो उनके परिवार को भी बहुत ख़ुशी मिलती है।

मेरा मकसद सिर्फ अकेले आगे बढ़ना नहीं है। मैं चाहता हूँ की सभी बच्चों को भी साथ में बढ़ूँ, फिर चाहे वह चबूतरा से जुड़े हों या किसी भी फिल्म संसथान से जुड़े हों। मैं सबको अवसर दिलाने का भरपूर प्रयास करता हूँ।

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