मुंबई के गणपति-पण्डाल: यहाँ सभी मनोकामनाएँ होती हैं पूरी …

September 21, 2018 by No Comments

गणपति उत्सव की जितनी धूम होती है उतनी ही जल्दी ये उत्सव बीतता हुआ भी नज़र आता है। अब गणेशोत्सव अपने आख़िरी पड़ाव में पहुँच चुका है। गणेश जी की विदाई में अब कुछ गिने-चुने दिन ही बाक़ी हैं।

समय चाहे कम ही बचा हो लेकिन अब भी देर नहीं हुई है, अगर आप अब तक गणेश पंडालों के दर्शन के लिए नहीं निकले हैं तो हम आज आपको बता रहे हैं मुंबई के उन ख़ास पंडालों के बारे में जहाँ दर्शन करने के लिए हर साल भक्तों का ताँता लगा रहता है, इस साल आप भी कर आइए दर्शन इन पंडालों में।

लालबाग़ च्या राजा

मुंबई का सबसे प्रसिद्ध गणपति पंडाल “लालबाग़ च्या(का) राजा” है। 1934 से यहाँ गणेश पूजा की शुरुआत हुई। लालबाग पुलिस चौकी के पास पुतलीबाई चौल के लालबाग मार्केट में स्थित “लालबाग़ च्या राजा” मान्यता पूरी होने के लिए जाना जाता है।

कहते हैं कि यहाँ जाने वाले हर व्यक्ति की मनोकामना पूरी होती है। इसके पीछे भी एक कहानी है, 1932 में जब पेरू चौल के लोगों की दुकानें ख़तरे में आयीं और उनकी रोज़ीरोटी पर आँच आने लगी, उसके बाद उन्होंने ये प्रार्थना की कि अगर उनकी दुकान उन्हें वापस मिल जाती है तो वो एक गणपति पंडाल की स्थापना करेंगे।

कुछ परेशानियों और ढेर सारे प्रयासों के बाद उन्हें अपनी दुकानें मिल गयीं, ये दुकानें आजकल “लालबाग मार्केट” के नाम से जानी जाती हैं। बस उसके बाद ही इस पंडाल की स्थापना हुई। यहाँ की एक ख़ास बात ये भी है कि 1935 से आज तक हर साल बिलकुल समान मूर्ति बनायी जाती है और अब तो ये डिज़ाइन पेटेंट भी करवा लिया गया है।

लालबाग च्या राजा एक बहुत प्रसिद्ध पंडाल होने के कारण प्रसिद्ध नेता, अभिनेताओं से भरा रहता है और यहाँ हर दिन दर्शन करने वालों की भीड़ भी बहुत ज़्यादा रहती है। दर्शन के लिए दो तरह की व्यवस्था है केवल दूर से मुख दर्शन किया जा सकता है इसके लिए आम मौक़ों में एक से दो घंटे का समय लगता है, अगर आरती या ऐसा कोई मौक़ा हो तो पाँच से सात घंटे का समय भी लग सकता है।

दूसरे दर्शन में आपको गणपति की प्रतिमा के चरण स्पर्श का मौक़ा मिलता है, अगर आप यहाँ जाने के इच्छुक हों तो आपको पंद्रह से बीस घंटे का इंतज़ार करना पड़ सकता है, कई बार ये इंतज़ार चौबीस घंटे का भी हो जाता है। जितना वक़्त लालबाग के गणपति के डर्साहन में लगता है क़रीब उतना ही समय उनकी विसर्जन यात्रा में लगता है। ये यात्रा पहले दिन सुबह 10 बजे से शुरू होकर अगले दिन सुबह क़रीब 8 बजे तक पहुँचती है।

मुंबई च्या राजा, गणेश गली

मुंबई च्या राजा लालबाग़ से थोड़ी ही दूरी पर है। इसकी प्रसिद्धि भी कम नहीं है, ये पंडाल लालबाग़ का सबसे पुराना पंडाल है 1928 में स्थापित हुआ ये पंडाल अब अपने नब्बे वर्ष पार कर चुका है। यही नहीं इस पंडाल की सबसे बड़ी ख़ासियत है कि यहाँ हर साल देश के विभिन्न प्रसिद्ध स्थानों की तर्ज़ पर पंडाल बनाया जाता है।

इस वर्ष पंडाल को ग्वालियर के सूर्य मंदिर की तरह सजाया गया है और गणेश प्रतिमा सफ़ेद घोड़ों के रथ पर सवार नज़र आ रही है । ख़ूबसूरती से सजा ये पंडाल भक्तों का मन मोहता है। यहाँ की सुंदरता देखने के लिए आप रुक ही जाएँ तो अलग बात है वरना यहाँ श्रीगणेश के दर्शन के लिए बीस से पच्चीस मिनट का इंतज़ार ही करना पड़ता है। लेकिन ये पंडाल भी व्यस्ततम पंडालों में से एक है। सुबह हो या देर रात आपको हर समय यहाँ भीड़ मिलेगी।


बात करें विसर्जन की तो गणेश गली के मुंबई च्या राजा की विदाई भी बड़ी धूमधाम से होती है। प्रतिमा सुबह आठ बजे से निकलकर विभिन्न मार्गों की सैर करती हुई रात आठ-साढ़े आठ के क़रीब विसर्जन के लिए पहुँचती है।

खेतवाड़ी गणराज

खेतवाड़ी गणराज की सबसे बड़ी ख़ासियत है यहाँ की गणेश प्रतिमा, जो हर वर्ष अलग-अलग रचनात्मक रूप में होती है। इस पंडाल की स्थापना 1959 में हुई थी। जब आप खेतवाड़ी गणेश देखने जाते हैं तो आपको एक अलग नज़ारा देखने मिलता है वो ये कि यहाँ हर गली में एक गणपति आपको देखने मिलेंगे इस तरह आपको कई गणेश प्रतिमा देखने मिल जाएँगी।

इस गणेश पंडाल के नाम एक रिकॉर्ड भी है. वो है कि 2000 में भारत की सबसे ऊँची गणेश पूजा मनाने का, वो प्रतिमा 40 फ़ीट ऊँची थी और भरपूर सोने के गहनों और हीरे से सजी हुई थी। गिरगाँव की बारहवीं खेतवाड़ी लेन में स्थित इस गणपति पंडाल को इस साल अक्षरधाम मंदिर की सजावट दी गयी है।

GSB सेवा, किंग सर्कल गणपति

GSB सेवा यानी गौड़ सारस्वत ब्राह्मण सेवा, किंग सर्कल गणपति विश्व के सबसे अमीर गणपति मंडल माने जाते हैं। इन्हें “गोल्ड गणपति” के नाम से भी जाना जाता है। इस मंडल की शुरुआत कर्नाटक के गौड़ सारस्वत ब्राह्मण समाज ने 1954 में की थी, वो ही इसे मुंबई लेकर आए।

इस पंडाल में गणेश प्रतिमा की सजावट में 60 किलो से ज़्यादा सोना और क़रीब 175 किलो चाँदी का इस्तेमाल होता है, ये बात भी इस पंडाल का विशेष आकर्षण होती है। पूजा- पाठ के मामलों में ये पंडाल विधि- विधान को ज़्यादा मानने वाला है यहाँ पूजा से पहले परंपरागत तरीक़े से तैयार होना होता है। यहाँ पूरे दिन बजने वाला संगीत भी आम नहीं होता बल्कि परंपरागत तौर से दक्षिण भारत के मंदिरों में बजने वाला शास्त्रीय संगीत ही बजाया जाता है।

ये पंडाल पूरी तरह से ईको-फ़्रेंड्ली है। अब इस पंडाल में गणेश प्रतिमा का दर्शन आप अगले साल ही कर पाएँगे क्योंकि यहाँ मूर्ति पहले पाँच दिनों तक ही स्थापित होती है।

अंधेरी च्या राजा

अंधेरी च्या (का) राजा सबर्बन मुंबई में वही महत्व रखता है जो दक्षिण मुंबई में लालबाग़ च्या राजा का है। यहाँ की भी बहुत मान्यता है। 1966 में इस पंडाल की स्थापना लालबाग़ से काम के सिलसिले में अंधेरी शिफ़्ट हुए वर्कर्स ने की थी। अंधेरी च्या राजा की प्रतिमा हर साल एक समान ही रहती है, उनके सिर पर 3.1 किलो सोने का ताज सजता है जो वहाँ चढ़े चढ़ावे से ही लिया गया है।

इस पंडाल का मुख्य आकर्षण है यहाँ हर वर्ष भारत के किसी प्रसिद्ध मंदिर की सजावट को दर्शाना, इस वर्ष महाराष्ट्र में स्थित अष्टविनायक मंदिरों में से एक चिंतामणि मंदिर का रूप पंडाल को दिया गया है।

अंधेरी के वीरा देसाई रोड में स्थित अंधेरी च्या राजा में दर्शन के लिए जाने से पहले आपको एक बात का ख़ास ख़याल रखना होगा वो ये कि यहाँ आपके पैर खुले हों ऐसे कपड़ों में अंदर जाने की अनुमति नहीं है।

इस गणपति का दर्शन के लिए आपको बाक़ी पंडालों से अतिरिक्त समय मिलता है क्योंकि जहाँ बाक़ी पंडाल विसर्जन अनंत चतुर्दशी के दिन करेंगे वहीं अंधेरी च्या राजा का विसर्जन उसके पाँच दिन बाद संकष्ट चतुर्थी के दिन होगा। विसर्जन में क़रीब 20 घंटे का समय लगेगा।

चिंचपोकली च्या चिंतामणि

मुंबई के सबसे पुराने गणपति पंडालों में से एक चिंचपोकली च्या चिंतामणि है, जो इस वर्ष अपने 99 वें साल में क़दम रख चुका है। यहाँ हर वर्ष 18 फ़ीट ऊँची प्रतिमा तैयार की जाती है, पिछले वर्ष का विशेष आकर्षण था सुप्रसिद्ध फ़िल्म बहुबली के महिशमती साम्राज्य को यहाँ दर्शाया गया था।

इस वर्ष की शोभा भी निराली है, पहले दर्शन के लिए ही भक्तों की भारी भीड़ यहाँ पहुँच गयी थी। मंडल ने एक ही दिन में 53,000 टी- शर्ट बेची और क़रीब 1 करोड़ 60 लाख रुपए की कमाई की। लेकिन ऐसा नहीं है कि यहाँ की कमाई का ग़लत इस्तेमाल होता है। हर वर्ष यहाँ जितनी भी कमाई होती है उसका 60 प्रतिशत हिस्सा मंडल सार्वजनिक कार्यों में लगाती है जिनमें आदिवासी समाज की सेवा, एक नर्सरी चलना और एक लायब्रेरी का ख़र्च शामिल है।


मुंबई के इन पंडालों के अलावा भी कई पंडाल अपनी-अपनी जगह प्रसिद्ध हैं। देख आजाए तो हर पंडाल की अपनी ख़ूबसूरती होती है और वहाँ के लोगों की मेहनत भी, आपके घर के आसपास भी कई होंगें। गणेश-उत्सव का मुख्य उद्देश्य है आपस में लोगों से मिलना और एक साथ, एक सूत्र से बँधने की कोशिश करना।

किसी भी जगह की मान्यता सिर्फ़ हमारी सोच से बनती है, आपको मीलों दूर जाकर भी शांति मिल सकती है और अपने घर के के किसी कोने में भी। याद रखिए कि भगवान हर इंसान के अंदर मौजूद हैं, आपसी भाईचारे से ईश्वर को प्रसन्न करना ज़्यादा आसान है।

(नेहा शर्मा)

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